भावों के आधार पर ही भव होते है विशुद्धसागर महाराज
बड़ौत
07-03-2023
गुरुवर श्री विशुद्धसागर जी ने धर्म सभा में कहा कि जैसे अंतरंग में परिणाम होंगे, वैसे भव होंगे। भावों के आधार पर ही भव होते हैं। भावना के अनुसार भाषा होती है। जो कार्य प्रकट दिख रहा है, उसका कोई-न- कोई कारण भी है। कारण के बिना कार्य नहीं होता है। आज जो पूज्यता को प्राप्त हो रहे हैं उन्होंने पूर्व में तप साधना, संयम धारण किया है था, उसका सुफल् वर्तमान में प्रष्ट दिख रहा है। कार्य को देखकर कवन मत करो, उसके कारण को भी समझो।
महाराज श्री ने सटीक बोलते हुए कहा की हमने ही रास्ते में काँटे फेंके हैं, वही चुभ रहे हैं। हमने पाप न किए होते, तो उद्य में क्यों आते?



भावों से ही आत्मा परमात्मा बनता है। भाव को सँभालो, भाव और भावना से ही भव का नाश होता है। मौन महान साधना है। मौन से सर्वविघ्न-बाधायें टल जाती हैं।
जिसको कार्य- अकार्य का बोध हो वही श्रेष्ठ मानव है। सज्जन को सदैव हिताहित का बोध होता है। श्रेय अप्रेय, यश-अपयश, लाभ-अलाभ के विचार पूर्वक ही कार्य करना चाहिए। पचिम भाव, निर्मल आचरण, सहयोग, पवित्र समता सज्जनता की पहचान है। जिस वृक्ष की जड़े मजबूत होती हैं, वह हवा के झोंके में भी अडिग रहते हैं। वैसे ही जिनका आचरण पवित्र और उत्कृष्ट होता है, वह उपसर्ग आने पर भी डगमग नहीं होते हैं।
पाप मत करो, पाप का फल बहुत कष्टप्रद होता है। जियो और जीने हो। जीवन जीना कठिन नहीं है, परन्तु यशस्वी जीवन जीना श्रम साध्य है। जीवन पर्यन्त यश के साथ जीना, जीना, यश के साथ प्राप्त होना, बहुत बहुत दुर्लभ है। इस दुनिया में किसी के मृत्यु को पैर सुन्दर हैं, किसी के पंख सुंदर हैं और किसी के उप आचरण सुंदर हैं। चरण और आचरण दोनों सुंदर पुण्यात्मा के ही हो सकते हैं। जीवन में संतोष के लिए अदृष्ट उपलब्धि को भी निहारना चाहिए। दृष्टको ही मत देखो, अदृष्ट को भी निहारो।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
