मानव का जीव मन की इच्छाओं विषय के कारण कर्मों से पराधीन है वर्धमान सागर महाराज
उदयपुर
आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर महाराज ने तप और संयम की व्याख्या करते हुए बताया कि तप और संयम के द्वारा ही व्यक्ति आत्मा को परमात्मा बना सकता है।
उन्होंने मानव के मन के विषय में कहा कि मानव का जीव मन इच्छाओ एवं विषयों के कारण कर्मों से पराधीन होता है। उन्होंने आगे कहा कि आत्मिक मनोबल से ही शारीरिक बल मिलता है।


अपने तीर्थंकर के उच्च कुल जैन धर्म में जन्म लिया है। इसलिए अपने जीवन में आत्मा के कर्म रूपी आवरण को तप संयम व्रत के मक्खन से नवनीत बनाने यानी आत्मा से परमात्मा बनाने की जरूरत है।



आत्मा की सुरक्षा के लिए अनुशासन सुरक्षा कवच है। साधु भी अपने जीवन को सार्थक करने के लिए धर्म धारण करते हैं एवं उसकी पूर्ण रूपेण पालन करते हैं। और जीवन को सार्थक बनाने के लिए मरण को सुमरण बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं। हम अपने जीवन को अंतिम जीवन तो नहीं मान सकते।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
