भगवान और गुरु ना बन पाए तो कोई बात नहीं उनको देखने का आनंद तो ले सुधासाग़र महाराज
ललितपुर
अभिन्नदनोदय तीर्थक्षैत्र ललितपुर में निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव दिव्य ज्ञान के धारी 108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहा की अगरमैं भगवान नहीं बन पाया कोई बात नहीं लेकिन भगवान तो मिल गए भगवान को पहचान तो लिया.भगवान को देखने मिल गया।-आंनद हो गया की सच्चे भगवान की शरण मिल गई।
उन्होंने एक उदाहरण के माध्यम से कहा की पंडित बनारसीदास जी समयसार ग्रन्थ को ढूंढ रहे थे।किसी ने लाकर दिया तो वे आनंद भर गये। नाच उठे। उन्होंने रत्न भर कर गिनकर नहीं भर ग्रन्थराज को लाने वाले को भेंट कर दिया। वो आनंद बहुत बड़ा आनंद है।
पूज्य मुनि श्री ने कहा जब भगवान को पहचान लिया तो आनंद आनंद है, तो फिर साक्षात भगवान को देखने का क्या कहना। ऐसे ही गुरु को पहचान लिया गुरु महाराज के दर्शन का आनंद आ गया आनंद तो लो। चाकलेट खाना नहीं चाकलेट चूसी जाती है। बड़ो को चाकलेट को मना क्यों किया जाता है क्योंकि उन्हें खाना नहीं आता। बच्चा चाकलेट के मुंह में लेता, चूसता और बाहर निकल लेता फिर थोड़ा मुंह देता है और आनंद मनाता है। ये है चाकलेट खाने की कला है। ऐसे ही प्रभू दर्शन का आनंद लेना आपको सीखना है।.

उन्होनें कहा शिष्य वह नहीं है जो गुरु की बात मान लें शिष्य वह है जो गुरु की चुनौती को स्वीकार कर ले। आप लोग कौन सा पेपर पसंद करेंगे? इनमें से सिर्फ पांच प्रश्न हल करें, या सभी हर दो के बीच से एक प्रश्न हल करें। तो आप सरल को ही पसंद करेंगे। सही छात्र वह है जो चुनौती दे। कि कहीं से भी पूछ लें हम हल करने को तैयार हैं।मन्दिर में आप शांत बैठते हैं मन्दिर से बाहर कितनी देर रह पाया।मन्दिर से बाहर कितनी देर तुम्हारा मन पवित्र रहा। मन्दिर तुम्हारे साथ रहा। तुम मन्दिर में कितने रहें। उन्होंने प्रश्न किया की मैं ये पूछा रहा हूं कि मन्दिर कितनी देर तुम्हारे साथ रहा? मन्दिर तो पवित्र है, पावन है, हम रहें तो पावन रहें, बाहर आने के बाद हम अपने मन्दिर के संस्कार को कहा तक लाये ये देखना है।.भगवान को पहचानना-मैं भगवान नहीं बन पाया कोई बात नहीं लेकिन भगवान तो मिल गए भगवान को पहचान तो लिया। भगवान के समवशरण की छवि अपने भीतर बैठा लो।
अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
