संसार में दूसरों को संतुष्ट करने जाओगे तो असंतुष्ट हो जाओगे अजीत सागर महाराज
सागर
पूज्य मुनि श्री अजीत सागर महाराज ने सागर के भाग्योदय तीर्थ परिसर में अपने उद्बोधन में आदमी की पहचान बताते हुए कहा कि जो भी व्यक्ति अपनी इंद्रियों को संयमित लेता है वही आदमी कहलाता है।
वह ज्ञानी जन की परिभाषा बताते हुए कहा कि ज्ञानी जन कभी भी गांठ में उलझते नही है, बल्कि इन्हे खोलते ही रहते हैं। सुखमय जीवन का रहस्य बताते हुए कहा कि सुखमय जीवन का रहस्य अंदर की गाठो को खोलने मे है। उन्होंने कहा कि मन की गांठों को खुलने में बहुत समय लगता है।
उन्होंने संसारी लोगों की समझ के विषय में कहा कि संसारी लोगों की समस्याओं को समझना बहुत ही ज्यादा कठिन होता है अगर हम लोगों को संतुष्ट करने में लग जाएंगे तो स्वयं असंतुष्ट हो जाएंगे। इसीलिए अपने आप को संतुष्ट करो किसी के पुण्य को तोलने के लिए अपने तराजू को मत रखो। स्वयं का पुण्य अलग होता है, दूसरे का पुण्य अलग होता है। मोक्ष का कारण श्रुत का भाव होना है। किसी भी व्यक्ति के जीवन में गांठ बांधना तो बहुत सरल होता है लेकिन उस गांठ खोलना बहुत और उसे खोलने में बहुत परेशानियां आती हैं। दूसरों की बुराई करना सबसे बड़ी बुराई बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि दूसरे का कोई जो भी पुण्य पाप हो वह स्वयं ही जाने, यदि हमने किया है तो वह पाप स्वयं को ही भोगना है। समय सभी का आता है, उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव के प्रति हमारा रक्षा का भाव होना चाहिए। दूसरों के अहित करने का भाव नहीं आना चाहिए। यदि स्वयं को अपना मार्ग प्रशस्त करना है तो संयम को धारण करना होगा। सूरत से नहीं आदमी गुणों से बनना चाहिए।
उन्होंने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की बात को कहते हुए कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जो सही आद मी है। आद का आशय पुरुषार्थ पुरुषार्थ करने वाले आदमी से
दमी का अर्थ इंद्रियो का वितरण रोकने वाला वही आदमी है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
