विनय मुक्ति का द्वार है आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज

धर्म

विनय मुक्ति का द्वार है आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज
बड़ौत

आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्म- सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि- कुलहीन कभी अच्छे विचारों पर विचार नहीं करता है, वह हमेशा कलह, कषाय, अशान्ति और विद्रोह के विचार करता है। कषाय भाव जीवन को कलंकित करता है।

 

 

 

उन्होंने कहा विचारशीलता, विनय, मधुर-भाषण कुलीन- पुरुषों की पहचान होती है। सज्जन पुरुष कुल-हीन वाचाल- पुरुषों से ऐसे ही डरते हैं जैसे सिंह-सर्प जैसे खूँखार हिंसक – प्राणियों से। विपत्ति के समय भी सज्जन अपनी सज्जनता नहीं छोड़ते हैं। क्रोधी, कुलहीन, नीच मनुष्यों से कलह की अपेक्षा मौन और माध्यस्थभाव ही श्रेष्ठ है। स्वयं की विशुद्धि महत्त्वपूर्ण है। परिणामों की विशुद्धि ही आत्म शान्ति में सहायक है। बाह्य सर्व-प्रपंच अशांति, दुःख, चिंता और परेशानी के ही निमित्त हैं।

 

 

उन्होंने आगे कहा दान और धर्म उत्साह पूर्वक करना चाहिए। प्रसन्न -चित्त पूर्वक किया गया सुकार्य सिद्धि, प्रसिद्धि का कारण है। दान और पूजा स्वयं करो । भृत्यों से कराया गया दान आत्म-विशुद्धि का कारण नहीं है। दान वही श्रेष्ठ है, जो स्व-पर कल्याण के उद्देश्य से भरा हो। परस्पर में उपकार करना ही जीव का कर्तव्य है। परोपकार – भावना से शून्य मानव, मानव नहीं हो सकता है। जैसे धन विपत्ति में काम आता है, वैसे ही संकटों के समय जिनवाणी के सूत्र काम में आते हैं। गुरुओं की पवित्र वाणी हमारे जीवन में औषधि के समान उपकारी है। प्रत्येक मानव को स्व-सयोपशम अनुसार गुरुओं के प्रवचनों को सुनकर आत्म-कल्याण करना चाहिए।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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