हमेशा कार्य करने से पहले महापुरुषों का स्मरण करना चाहिए अजीत सागर महाराज
सागर
भाग्योदय तीर्थ परिसर में अपनी मंगल वाणी से पूज्य मुनि श्री अजीत सागर महाराज ने बताया कि क्रूरता जहां पर भी होती है वहां कभी दया का स्थान नहीं हो सकता है।
उन्होंने कहा कि जब कोई भी कार्य की शुरुआत करें तो महापुरुषों का स्मरण करना चाहिए। एक उदाहरण के माध्यम से समझाया कि कोई भी कीमती धातु या हीरे को तराशने पर ही वह कीमती होता है। यदि उसे तराशा नहीं गया तो वह कीमती नहीं हो सकता। संत साधुओं के विषय में बोलते हुए महाराज श्री ने कहा कि संत साधुओं को कभी किसी के पराधीन नहीं होना चाहिए। केश लोचन करते समय अपने हाथों को ही काम में लेना चाहिए। दूसरों की अपेक्षा एवं दूसरों के भरोसे बैठे रहेंगे तो पराधीन रह जाओगे। केशलोच के विषय में कहा कि केशलोच साधु के संयम और वैराग्य की परीक्षा हैं। उन्होंने शंकर जी से कभी नहीं डरने की बात कही एवं उन्होंने यह भी कहा कि जो सोचता रह जाता है वह कभी कुछ नहीं कर पाता है। जो मार्ग पर चलना है चलता है वह सोचता नहीं है। उत्साह और साहस बढ़ाना यह साधु का कार्य होता है।
आज के परिपेक्ष के ऊपर कटाक्ष करते हुए महाराज श्री ने कहा कि पहले नारी घूंघट में रहती थी। लेकिन आज ना तो मां का आंचल बचा है। और ना ही घूंघट बच्चों को पहले मां के आंचल में सुलाते, लाड करते थे। लेकिन आजदासी या आया बच्चों को पाल रही हैं। आज यदि कहीं बहू सिर पर घूंघट लेकर जा रही हो तो लोग तुरंत कह देते हैं, यह पुराने जमाने की है।घूंघट पर महिलाओं को सम्मान मिलता है। हीरों और रत्नों को छुपा कर रखोगे तो कीमत बढ़ेगी। बाहर निकालो तो कीमत और चमक कम होगी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
