प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गाणिनी आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी के 54 वे वर्ष वर्धन दिवस पर भावभीनी विनयाजली
जिनका जीवन संयम साधना से भरपूर है जिनके जीवन की त्याग तपस्या सचमुच अद्भुत है। जिनका वात्सल्य सभी को धर्म से और अध्यात्म से जुड़े रखता है ऐसी महान साधिका प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गाणिनी आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी के 54 वे वर्ष वर्धन दिवस पर कोटि-कोटि नमन करते हैं।
संयम त्याग की है यह प्रतिमूर्ति
धर्म प्रभावना मां विशुद्ध मति माताजी की है यह ज्योति
धर्म से सदा सबको जोड़े रखती
वात्सल्य की है यह प्रतिमूर्ति
समता रस की है यह ज्योति
जय हो गुरु मां विज्ञमति
आज सब है पल्लवित
गुरु मां ने किया है गौरवान्वित
पूज्य माताजी ने जिनवाणी का जिन शासन की प्रभावना में जो योगदान दिया है वह अविस्मरणीय है उन्होंने अपने ज्ञान ज्योति के चक्षु से सभी को धर्म का ज्ञान कराया है और अनेक पुस्तकों वह साहित्य का सृजन कर भक्तिमय भजनों की रचना की है। इनके द्वारा रचित भजनों को जब गुरु मां के मधुर कंठ से स्वर लहरियों के साथ चुना जाता है तो हर कोई व्यक्ति परमात्मा से जुड़ जाता है और अपने अंदर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर लेता है।
विशुद्ध मति माताजी के शिष्यतव में रहकर धर्म का ज्ञान अर्जित किया है साथ ही इन्होंने गुरु के प्रति अपना जो समर्पण रखा है और रख रही हैं वह अपने आप में वर्तमान में गुरुकुल की पद्धति को जीवंत रखता है। धन्य है हम सभी श्रावक जन इनकी सन्निधि और इनके दर्शन और इनका पावन आशीष हमें प्राप्त हुआ है।
20 जुलाई 1969को जन्मी
उत्तर प्रदेश की एटा नगर का गौरव न्यारी
श्री जिनेद्र प्रकाश जैन,श्रीमती रेशम देवी जैन की की राजदुलारी
आभा जैन नामकरण को जो पाई
एटा नगरी में थी खुशी छाई।
16 वर्ष की जब उम्र है आई
संसार चक्र की मोह ममता इनको न भाई
एटा न गणिनी आर्यिका विशुद्धमति आई
ब्रह्मचर्य व्रत लेकर संयम पथ पर कदम बढ़ाई
आगे बढ़ते बढ़ते वह घड़ी आई।
9-10-2008 कोटा राजस्थान में विजयादशमी को आर्यिका दीक्षा की लेकर नामकरण हुआ आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी
भजनों की संकलित एल्बम –
(1) विशुद्ध विनयांजलि
(2) रत्नत्रय भक्ति दीपक 24तीर्थंकर प्रभु चालीसा
(3) गुरु माँ विशुद्ध की ओडेगे चंदरिया जैसे कई भक्तिमया भजनों को अपनी ज्ञान चक्षु से रचकर सभी को प्रभु से जोड़ा दिया इन भजनों को गाकर भक्त अपने आप में नई ऊर्जा से भर जाता है और वह परमात्मा की समीप आता है।
रचित साहित्य –
(1) शनिगृह निवारक तीर्थंकर मुनिसुव्रत विधान
(2) आदिनाथ विधान
(3) रत्नत्रय भक्ति दीपक तीर्थंकर तीर्थंकर प्रभु के चालीसा
(4) श्री पार्श्वनाथ विधान
(5) पूजाजली
(6) आराधना की साधना
(7) आई दिवाली करे पूजन
(8) विशुद्धभक्ति गीता जिनसहस्त्रनाम विधान रचना कर जिनवाणी का रसपान करा कर जिनशासन की ध्वजा को जयवंत किया है।
इस पुनीत अवसर हम यही कामना करते है, आपका रत्नत्रय इसी तरह फलीभूत होता रहे आप दीर्घायु हो और सदा संयम पद पर और अग्रसर हो शत शत वन्दामी !!
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
