प्रभु को नमस्कार करने से कई फ़ायदे होते है मुद्रा में दोनों हाथों को मुकुलीकृत जोड़ा जाता है। इसमें महान् वैज्ञानिकता छुपी है,भावसागर महाराज
घाटोल
आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री 108 भावसागर महाराज ने नगर के बासपुज्य मंदिर अपनी पीयूष वाणी मे भगवान को हाथ जोड़कर नमस्कार करने के कही फायदे का उल्लेख किया उन्होने हाथ जोड़कर नमस्कार करने की प्रक्रिया को भी बताया की हाथ जोडने की मुद्रा मे दोनों हाथोको मुकुलीकृत जोड़ा जाता है।
उन्होने इस तरह की प्रक्रिया मे कही महान वैज्ञानिकता है, इसका वैज्ञानिक रहस्य बताते हुए कहा की जब हम मुकुलीकृत हाथ जोड़ते हैं तब दोनों हाथों की अंगुलियों के ऊपरी नाखून वाले पोर आपस में स्पर्श करते हैं। उन स्थानों पर नासिका से सम्बन्ध रखने वाली सिराएँ होती हैं। इसलिए एक्यूप्रेशर में वहाँ नासिका से सम्बन्ध रखने वाले प्वाइण्ट माने गये हैं। अतः जब वन्दना- मुद्रा में मुकुलित हाथ जोड़ते हैं तब वे प्वाइण्ट दबते हैं जिससे सुषुम्ना नाड़ी चलने लगती हैं, श्वास का प्राणापान ठीक होता है और मन एकाग्र होता है। जब मुकुलित हाथ जोड़ते हैं तब अंगूठे से अंगूठा स्पर्श करता है और दोनों अंगूठे तर्जनी की ओर मुड़कर स्पर्श करते हैं। उस अंगूठे के छोर में मस्तिष्क से सम्बन्ध रखने वाले प्वाइण्ट होते हैं, उन पर प्रेशर पड़ता है जिससे मस्तिष्क तरोताजा होता है, सही-सही कार्य करता है और उपयोग बाह्य जगत् से हटकर अपनी ओर आता है। मुकुलित हाथ जोड़ने पर अनामिका के नीचे हथेली का भाग स्पर्श करते हैं। वहाँ हृदय से सम्बन्ध रखने वाला प्वाइण्ट होता है। जिस पर प्रेशर पड़ता है। अतः हृदय श्रद्धा, भक्ति और विनय से भर जाता है और सही-सही कार्य करने लगता है। आमतौर पर हम देखते हैं कि जब कोई हाथ जोड़कर एक दूसरे को अभिवादन करता है अथवा भगवान् की विनय करता है तब सहज ही सिर झुक जाता है। भारतीय धर्म एवं संस्कृति में वन्दना, नमस्कार और अभिवादन हाथ जोड़कर करना पूर्णतः वैज्ञानिक है। इसी प्रकार पंचांग आदि मुद्राओं से नमस्कार करने पर हमारे शरीर एवं ग्रन्थियों पर लाभकारी अनेक प्रभाव पड़ते हैं। इस प्रकार नमस्कार पूर्णतः वैज्ञानिक है।
नमस्कार का अर्थ
महाराज श्री नमस्कार का अर्थ बताया की इसका अर्थ होता है आदर, स्वागत, प्रणाम, नमस्कार, सम्मान, शिष्या, स्नेह, आत्मियता, सहृदयता, श्रद्धासहित संकेत आदि। चरण स्पर्श कर अभिवादन भारतीय संस्कृति में माता, पिता, गुरु और अपने से बड़ों का चरण स्पर्श करके अभिवादन करने की, बड़ों के द्वारा छोटों को शुभ आशीष देने की और बराबर वालों को शुभकामनाएँ प्रकट करते हुए हाथ जोड़कर इष्ट देवता आदि का उच्चारण करके अभिवादन करने की परम्परा अति प्राचीनकाल से रही है। हाथ जोड़कर अभिवादन – जब हाथ जोड़कर आपस में एक दूसरे का अभिवादन किया जाता है तब दोनों के हृदय श्रद्धा, प्रेम और वात्सल्य से भर जाते हैं और विनय से सिर अपने आप झुक जाता है। इसलिए स्तुति, वन्दना और अभिवादन हाथ जोड़कर करना चाहिए, न कि हाथ मिलाकर। हाथ मिलाकर अभिवादन हाथ मिलाकर अभिवादन करना हर दृष्टि से अनुचित है, क्योंकि हाथ मिलाने से संक्रामक रोगाणुओं का आदान-प्रदान हो सकता है। शरीर में संचित दिव्य ऊर्जा हाथ मिलाने वाले के सम्पर्क में आने से न्यूटल (अर्थ) हो जाती है। जबकि हाथ जोड़ने से द्रव्य ऊर्जा और अधिक संगृहीत होती है। माता, पिता और गुरुओं के हाथ जब मस्तिष्क पर रखे जाते हैं तब दिव्य ऊर्जा, उत्साह, आनन्द और शान्ति की प्राप्ति होती है। जब व्यक्ति हाथ मिलाते हैं तब सर्वप्रथम अपना अंगूठा सामने वाले की ओर दिखाकर हाथ बढ़ाते हैं जिससे नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। अंगूठा दिखाना अशुभकारक होता है जिसे कुछ नहीं देना होता है या जो दुश्मन होता है उसे अंगूठा दिखाते है
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
