हमेशा अच्छे कार्य कि स्मृति को याद रखना चाहिये इससे बड़े से बड़े कार्य हो जाते हैं आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
– डोंगरगढ़
आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज ने चंद्र गिरी तीर्थ डोंगरगढ़ में अपनी पीयूष वाणी का रसपान कराते हुए करते हुए सुख-दुख को नश्वर बताते हुए इसका आशय समझाया कि कहा जाता है कि धूप के बाद छाया होगी और छाया के बाद धूप, रात के बाद दिन और दिन के बाद रात दुख के जाने के बाद सुख आए और सुख के बाद दुख आए ऐसा कोई जरूरी नहीं है और ऐसा कोई नियम नहीं होता है। इस पर ब्रेक लगा सकते हैं।
उन्होंने महान पुरुष वह महापुरुष के विषय में वर्णन करते हुए समझाया कि महापुरुष कभी भी सुख-दुख की परंपरा से भयभीत अथवा डरते नहीं हैं। उन्होंने सुख दुख का उपाय बताते हुए कहा कि हम सभी इसका ऐसा उपाय कर सकते है, जिसके द्वारा दोनों का अभाव कर सकें। इसी श्रद्धान को रखते हुए महापुरुष कभी दुख से डरा नहीं करते, एवं सुख में किसी प्रकार की रुचि नहीं लेते हैं। | सुख दुःख तो नश्वर है।
उन्होंने डकार का उदाहरण देते हुए कहा कि हमें डकार जब आती है जब भोजन कर लेते हैं भोजन करने के कुछ समय निकलने के बाद वह डकार आती है जो खाया है उसी का रस डकार में आता है हम खट्टा खाएंगे तो खट्टी डकार आएगी मीठी डकार कैसे आ सकती है। उन्होंने समझाया कि खट्टी मीठी को ना देखते हुए, उसी प्रकार वर्तमान समय में भूत के दुखों को याद कर जो लोग दुखी हो जाए और कोई घटना घटी तो जाने पर दुखी ही रहे। ऐसा कोई नियम नहीं होता है। यदि अच्छे कार्यों की स्मृति को याद रखेंगे तो बड़े से बड़े कार्य संपादित हो जाते हैं। विद्यालय में विद्या अध्ययन करने वाले का जब परीक्षा का समय आ जाता है तो डर के घबराने के कारण से जो बच्चे अच्छे से अच्छे होते हैं वह भी कुछ नहीं लिख पाते हैं। और असफल हो जाते हैं। फिर उन्हें समझाना पड़ता है कि इसे याद ना रखो और जो याद हैं उसे लिखें तो को सफल वह पास हो जाओगे। कुछ माता-पिता तो यह भी कहते हैं कि महाराज श्री के पास चले जाओ उनसे आशीर्वाद लो तो पास हो जाओगे।
आचार्य श्री ने आगम का एक उदाहरण देते हुए बताया कि चारो तरफ एकांत है मनुष्य का नामो निशान नहीं मात्र पशु – पक्षियों कि चहचहाहट सुनाई दे रही है | वहाँ दो व्यक्ति है परीक्षा कि घडी है, धैर्य का बाँध टूट रहा है ऐसी बाते करते रहते हैं | तभी वहाँ मुनि महाराज ने दर्शन दिया वे रिद्धिधारी थे उनको स्व और पर का ज्ञान था | वे मुनि महाराज से कहते हैं कि भगवान आपने दर्शन दे दिया बहुत अच्छा है | यह चट्टान, बड़े – बड़े पत्थर सर पर गिर गए तो क्या होगा गर्भ में शिशु है अब हमारा क्या होगा ? मुनि महाराज कहते हैं आपके गर्भ में जो शिशु है वह तद्भव मोक्षगामी जीव है वह इसी जन्म में मुक्त होगा | वह जन्म के समय माँ को कैसे पीड़ा दे सकता है उसके द्वारा ही आपको संबल मिलेगा | उसी के द्वारा आपका सभी कार्य होगा | उन्हें सांत्वना और आशीर्वाद देकर मुनि महाराज आकाश में उड जाते हैं | महाराज भी दुखी जीवो को देखकर एक सीमा तक ही उपदेश देते हैं | ज्यादा करने से दुःख के संवेदन से राग न हो जाए | आपको वह मुक्त तो नहीं कर सकते लेकिन मुक्ति का बोध अवश्य करा सकते हैं |
एक बहुत बड़ा सिंह दहाड़ते हुए गर्जना करते हुए बहुत तेजी से वहां आ जाता है | दोनों सखियाँ डर के कारण एक दूसरे से लिपट गयी | एक की शादी हुई थी तो एक उसकी सहेली उसके साथ आई थी| अब उसी बीच में अष्टापद आ जाता है और दोनों सिंह और अष्टापद के बीच में घमासान युद्ध होता है | युद्ध में अष्टापद सिंह को पछाड़कर भगा दिया और स्वयं वहाँ से चला गया | एक साता के उदय से और एक असाता के उदय से आया | अब उस शिशु का जन्म कैसे होगा जंगल में गुफा में दोनों अबला अकेले हैं ? तद्भव मोक्षगामी जीव होने के कारण प्रसूति के समय मेघराज बाजे बजा रहे थे और जब भव्य जीव जन्म लेता है तो ऊपर से बाजा आ जाता है और चारो तरफ प्रकाश ही प्रकाश आलोक हो जाता है | प्रतिदिन विद्याओं के माध्यम से भोजन मिलता था | मोक्षगामी जीव है अनेक प्राणियों का इससे उद्धार होगा | कुछ समय बाद वहाँ मामा आ गए| बीच में अनेक घटनाये होती है | कभी कभी कवी को दुःख का चित्रण करना बहुत कठिन हो जाता है | आपके दुःख को देखकर भगवान को आंशु नहीं आता लेकिन उनको इसका संवेदन होता है | दौलतराम जी ने ऐसी पंक्ति लिखी कि केवली भी आपके दुःख कि गाथा लिख नहीं पाए | संसार दुखी है चारो ओर सुख है ही नहीं | दुखी को देखकर दुखी नहीं होना यही सर्वज्ञ है | लेकिन यथावत भव्य जीव सम्यग्दृष्टि, होनहार वैरागी, वर्तमान में शांत रहता है | नरक में ३३ सागर तक जीव दुःख को भूख प्यास को सहन करता है | भद्र परिणामी जीव संसार के सुख दुःख को नश्वर मानकर साता असाता के उदय में धैर्य पूर्वक शांत बैठा रहता है | ऐसा अनुभव करने के लिये मुक्त होना पड़ेगा तब अनुभव में आएगा | अपने दुःख में रोना बंद कर देना लेकिन पर के दुःख में जो रोता है उसके लिये हमारा आशीर्वाद है और अपना दुःख कभी किसी के सामने नहीं रखना | हमारे लिये आचार्यों ने कहा है कि दुखी व्यक्ति को उद्बोधन दो या न दो पर उसका दुःख सुन अवश्य लेना जिससे उसका दुःख थोडा हल्का हो जाये | दूसरे के दुख को सुनना भी सीखो केवल अपना ही अपना देखते हो | भगवान से प्रार्थना करते हैं कि सभी शान्ति से धैर्य पूर्वक रहे और सभी का दुःख दूर हो जाये |
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
