जिनालय,जिनवाणी, संस्कृति, मुनि धर्म संरक्षण आचार्य श्री शांति सागर जी की देन आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज

धर्म

जिनालय,जिनवाणी, संस्कृति, मुनि धर्म संरक्षण आचार्य श्री शांति सागर जी की देन आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज
उदयपुर
तीर्थंकर प्रभु की दिव्य ध्वनि को गौतम गणधर स्वामी ने झेल कर जिनवाणी के रूप में शास्त्रों में लिपिबद्ध किया। उनके बाद अनेक आचार्यों ने जिनवाणी जिनेंद्र प्रभु द्वारा प्रतिपादित उपदेश को अनेक शास्त्रों , ताम्रपत्र आदि पर उल्लेखित किया आचार्य श्री ने बताया कि जिनवाणी के चारों अनुयोग प्रथमानुयोग ,द्रव्यानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग सभीहमारे लिए महत्वपूर्ण है।

 

 

 

यह मंगल देशना आचार्य शिरोमणी श्री वर्धमान सागर महाराज ने 6 दिवसीय 34 वे आचार्य पदारोहण कार्यक्रम अंतर्गत दूसरे दिन श्रुत आराधना महोत्सव पर आयोजित बीसा हूमड भवन में आयोजित धर्म सभा में प्रकट की । गजू भैया,पारस चितोड़ा,राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने प्रवचन में आगे बताया कि

 

समय-समय पर अनेक विद्वानों ने आचार्यों के निर्देश मार्गदर्शन में जिनवाणी संरक्षण का अनुकरणीय प्रशंसनीय कार्य किया है। आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने प्राचीन घटना का जिक्र कर बताया कि पंडित सुमेर चंद दिवाकर सिवनी जब मूड बद्री गए तब उन्होंने ताम्रपत्र ऊपर जिनवाणी को क्षतिग्रस्त हालत में देखा यहां तक की दीमक उनको नष्ट कर रही थी । तब पंडित जी ने आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज को जिनवाणी के परिस्थिति के बारे में अवगत कराया आचार्य शांति सागर जी महाराज ने महासभा के माध्यम से जनता को उपदेश दिया और धवला , महा धवला आदि अनेक ग्रंथों को ताम्रपत्र पर अंकित कराया गया ।इसके साथ ही अनेक ग्रंथों को नए सिरे से अनुवाद कर अलग-अलग भाषा में पुनः प्रकाशित कर जिनवाणी का बहुत बड़ा संरक्षण किया गया। फूलचंद जी शास्त्री द्वारा संपादन किया। भारतीय ज्ञानपीठ के माध्यम से ग्रंथों का प्रकाशन हुआ आचार्य शांति सागर जी को सुनकर आचार्य वर्धमान सागर जी ने बताया कि आचार्य श्रीशांति सागर जी ने जैन धर्म ,जिनालय, और जैन संस्कृति की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाई 1105 दिन तक मंदिर में विजातीय प्रवेश के विरोध में 1105 दिन तक अनाज आहार में ग्रहण नहीं किया आचार्य शांतिसागर जी ने शास्त्र अनुसार मुनि चर्या का पालन किया आचार्य श्री ने स्वयं ने अपने को देव शास्त्र गुरु द्वारा प्रतिपादित आगम अनुरूप जीवन को प्रयोगशाला बनाकर चरित्र को अपनाया जिसके लिए देश ही नहीं देश की समाज ही नहीं ,साधु समाज भी आचार्य शांतिसागर जी के प्रति कृतज्ञ है ।


आचार्य शांतिसागर जी ने देव शास्त्र गुरु आगम द्वारा प्रतिपादित उपदेश अनुसार जीवन को प्रयोगशाला बनाकर चारित्र को अपनाया आज सभी साधु समाज आचार्य शांतिसागर जी की देन है आचार्य शांतिसागर जी के आचार्य पद के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष में श्री पंडित आनंद शास्त्री कोलकाता के संयोजन में श्रीमती कुसुम छाबड़ा के माध्यम से अनेक दातारो द्वारा 100 ग्रंथों का प्रकाशन कराए जाकर आज उदयपुर में लोकार्पण कराया जा रहा है यह सभी के लिए अनुकरणीय और प्रशंसनीय कार्य है ।आचार्य श्री ने स्वाध्याय पर जोर देकर सभी को स्वाध्याय करने की प्रेरणा दी स्वाध्याय का विश्लेषण करते हुए विवेचना कर बताया कि स्व अध्याय अर्थात स्वयं का अध्ययन करना स्वाध्याय कहलाता है शास्त्र अनुसार स्वाध्याय में शास्त्र को पढ़कर समझने का प्रयास करें, मनन चिंतन करे ।इससे परम सुख प्राप्त होता है शरीर और मन का भी स्वस्थ रहना जरूरी है शरीर और मन स्वस्थ रहेगा तो बुद्धि भी स्वस्थ रहेगी जिससे जिनवाणी का रहस्य रूपी अमृत पान करने का अवसर मिलेगा ।
इस उपलक्ष्य में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सानिध्य
सभी 100 शास्त्रों की रथ एवम् पालकी यात्रा निकाली गई सोधर्म इंद्र जय कुमार कारवा जिनवाणी माता को मस्तक पर धारण कर हाथी पर बैठे। शोभा यात्रा का समापन हूमड़ भवन में हुआ। श्रीमती नीलिमा जैन के मंगला चरण के बाद आचार्य श्री शांति सागर जी के चित्र का अनावरण कर दीप प्रवज्जलन पंडित कुमुद सोनी,आनंद शास्त्री,सुरेश मारौरा,आदि अतिथियों ने किया।
दोपहर को श्रुत अलंकरण पूजन एवम् आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की पूजन की गई। शाम को मंगल आरती की गई।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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