धर्म से प्रीति कर आत्मीय शिव सुख की प्राप्ति के लिए मोह राग द्वेष दूर करने का पुरुषार्थ करे।आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज
उदयपुर
पूज्य आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा कि संसार में प्रत्येक प्राणी को पुत्र,पिता,माता,बहन आदि लौकिक परिजनों से प्रीति होती हैं
प्रीति का जो फल है हमारे संसार उपार्जन परिभ्रमण का कारण है। यह संसार को बढ़ाने वाली प्रीति है। वस्तुत आपको वीतरागी, सर्वज्ञ ,हितोपदेशी भगवान धर्म से प्रीति कीजिए ।यह मंगल देशना आचार्य शिरोमणी वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उदयपुर की धर्म सभा में प्रकट की।
ब्रह्मचारी गजू भैय्या,राजेश पंचोलिया इंदौर अनुसार आचार्य श्री ने उपदेश में बताया कि धर्म से प्रीति क्यों की जाए? जो आत्मा का हित चाहते हैं, आत्मा का कल्याण चाहते हैं, उनकी धर्म से प्रीति होती है। धर्म से प्रीति करने से आत्मा जो है संसार के दुखों से मुक्त होकर के ऐसे शाश्वत सुख को प्राप्त करता है। जहा कभी दुख होता ही नही है। सामान्य से सभी जानते है की स्वर्ग में सुख ही सुख है। दुख है ही नहीं। दुख का स्थान सभी जानते हैं दुख का स्थान नर्क है जहा दुख ही दुख है। तिर्यंच और मनुष्य पर्याय ऐसी है, जहां पर सुख भी होता है और दुख भी होता है। जिनकी प्रीति , स्नेह धर्म के प्रति हो जाता है, वह तिर्यंच हो या मनुष्य हो वह सुख को प्राप्त करते है। धर्म जो है वो सभी सुखों को देने वाला है।

सभी संपूर्ण धर्म सुख से ही शिवसुख की प्राप्ति होती है। वह सुख जिसके बाद दुख की प्राप्ति नहीं होती है। जहां शरीर भी नहीं है, जहां कर्म भी नहीं है, केवल हमारी आत्मा ही है। आत्मिक सुख जिसे कहते है, सिद्ध अवस्था में रहकर हमारी आत्मा सुख को प्राप्त कर सकती है। आचार्य श्री ने बताया हम संसार में परिभ्रमण कर रहे हैं प्रथमानूयोग के ग्रंथ के अध्ययन के बाद पता चलता है कि मोह, राग , द्वेष किस प्रकार अपना फल दिखाते हैं। जैन रामायण अनुसार आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि जब श्री राम के पिता दशरथ ने दीक्षा धारण कर ली और भरत की माता केकई के वचनों से वचनबद्ध होकर उन्होंने भरत को राज्य दे दिया। राम लक्ष्मण और सीता वन को चले गए। श्रीराम यह जानते थे कि यदि हम अयोध्या में रहेंगे तो भरत की बात को कोई नहीं मानेगा। इसीलिए वह जंगल में चले गए थे। उन्होंने कहा जो सच्ची माता है जो भारतीय परंपरा से जुड़ी हुई हैं कभी ऐसा नहीं कर सकती की अपने पुत्र के लिए राज्य मांगे और दूसरे पुत्र के लिए नहीं। माता केकई ने वैरागी पुत्र भरत को अध्यात्म से दूर करने के लिए पुत्र मोहवश राज्याभिषेक कराया।14 वर्ष के वनवास का प्रसंग जैन रामायण में नही है।
राजा दशरथ राम लक्ष्मण भरत आदि सभी मुनिसुव्रत नाथ भगवान के काल में ही हुए हैं। आचार्य श्री ने कहा पुण्य जिनके पास होता है उन्हें सब कुछ मिलता है और पुण्य उनके पालने में था। उन्होंने कहा वैवाहिक भोतिक, आत्मिक संपदा हो या धनसंपदा हो पुण्य के बिना प्राप्त नहीं होती है।
आप सब गरीब है
आचार्य श्री ने कहा की आप सब गरीब हैं आपको हम गरीब बता रहे हैं क्योंकि संसार का वैभव प्राप्त करने की इच्छा जिनके मन में होती है वह सब गरीब ही हैं। समता रूपी धन को लेकर रत्नत्रय रूपी धन को धारण करते है वास्तव में वह धनिक है।
आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मंगलाचरण पश्चात अतिथियों द्वारा आचार्य श्री शांति सागर जी एवम् पूर्वाचार्यों के चित्र का अनावरण कर दीप प्रवज्जलन किया। पुण्यार्जक परिवार द्वारा पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेट की
संचालन प्रकाश सिंघवी ने किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
