देव शास्त्र गुरुओं के समक्ष वेश भूषा खानपान की विकृति स्वयम के लिए धातक फटे कपड़े पहनने से अगले जन्म में दरीद्र कुल में जन्म होगा आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी। उदयपुर
पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी
आचार्य श्री ने देव शास्त्र एवम गुरुओं के समक्ष वेश भूषा एवम खानपान की विकृति तथा लड़के लड़कियों के फटे कपड़े जींस आदि पर चिंता व्यक्त कर प्रवचन में बताया कि आजकल समाज की महिलाएं सिद्ध क्षेत्र अतिशय क्षेत्रो मंदिरों आचार्य आर्यिका संघो के समक्ष शालीनता के मर्यादित वेशभूषा पहन कर नही आते है जो गलत है
समाज के महिला पुरुषों ने धार्मिक स्थलों को पिकनिक स्पॉट समझ लिया है। क्षेत्रो मंदिरों में आचार्य संघ ,आर्यिका संघ के समक्ष विशेषकर महिलाएं लड़कियां कटे फटे वस्त्र सलवार सूट टाइट चुस्त कपड़े पहनती है अब तो अधिक उम्र की महिलाएं भी अब देव स्थानों पर मर्यादित कपड़े नही पहन रही है।यह जैन धर्म के संस्कारों संस्कृति के विरुद्ध है। फटे कपड़े पहनने से आगामी जन्म दरिद्र कुल में होगा। इसलिए छोटे बड़े सभी को इस और ध्यान देना चाहिए ।यह धर्म संस्कृति के विरुद्ध है।
इसी प्रकार धार्मिक स्थलों पर जिस समय अभिषेक पूजन करना चाहिए, उस समय होटलों में समाज जन नाश्ता करते रहते है। देव स्थल आमोद प्रमोद के स्थल नही होकर आत्म चिंतन, मनन के स्थल है।इसी प्रकार देर रात्रि तक सिद्ध क्षेत्रो ,अतिशय क्षेत्रो ओर देव स्थलों पर होटलों में भोजन नाश्ता करना जैन धर्म के विपरीत होकर अन्य जैनेतर समाज मे विपरीत संदेश जाता है।वेश भूषा तथा खान पान की विकृति जैन धर्म के साथ स्वयम के लिए भी हानिकारक है।इससे पुण्य के बजाय पाप का आश्रव होता है।
समाज श्रावक की परिभाषा भूल गया है उसे देव शास्त्र एवम गुरुओं के प्रति श्रद्धावान , विवेक वान तथा क्रिया वान होना चाहिए।
आज सिद्ध क्षेत्रो विशेष कर श्री सम्मेद शिखर जी मे पहाड़ पर नाश्ते की दुकाने श्रावकों के कारण बढ़ रही है पहले के लोग जिस दिन सिद्ध क्षेत्रो की वंदना करते थे ,तब उस दिन उपवास करते थे। आचार्य श्री शांति सागर जी ने गृहस्थ अवस्था मे शिखर जी के वंदना कर आजीवन धी ओर तेल दो रसों का त्याग कर दिया ।सामूहिक संयुक्त परिवारों के स्थान पर एकल परिवारों के प्रचलन से अनेक परिवार स्वछन्द हो गए है।
राजेश पंचोलिया इंदौर वात्सल्य भक्त परिवार। संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
