अक्षय तृतीया पर विशुद्ध भावों से दिया गया आहार दान से प्राप्त पुण्य भी अक्षय होता हैआचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धर्म

अक्षय तृतीया पर विशुद्ध भावों से दिया गया आहार दान से प्राप्त पुण्य भी अक्षय होता हैआचार्य श्री वर्धमान सागर जी
उदयपुर
पूर्व जन्म के संस्कार के कारण जाति स्मरण से राजा श्रेयांश ने भगवान श्री ऋषभदेव को आहार दान दिया ।मुनिराज को आहार देने के लिए संस्कार होना चाहिए धर्म के संस्कार से भगवान का अभिषेक ,पूजन, विशुद्ध भावों सहित आहार दान देना श्रावक का मुख्य कर्तव्य है

 

 

 

 

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने यह मंगल देशना अक्षय तृतीया के मंगल अवसर पर सर्व ऋतु विलास उदयपुर में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त की। आचार्य श्री ने बताया कि सभी को अभिषेक पूजन और आहार दान देकर मनुष्य जन्म को सार्थक करने का प्रयास करना चाहिए। विशुद्ध भावों से दिया गया आहार दान से पंच आश्चर्य होते हैं । मजबूरी में दिया गया आहार दान सार्थक नहीं है।कितने नगरों में एक स्थान धर्मशाला में साधुओं का चौका लगाया जाता है।यह ठीक नही है आहार दान से आपका ही भला लाभ होगा। आचार्य श्री ने बताया किआचार्य श्री शांति सागर जी की परंपरा अनुसार शुद्ध जल ग्रहण करने वालों से ही आहार लेते हैं पूर्वाचार्यों के आशीर्वाद से अभी तक कोई अवसर नहीं आया कि किसी दिन आहार नहीं मिला हो। भगवान ऋषभदेव ने धर्म तीर्थ का प्रवर्तन करने के लिए बिहार किया था भगवान ऋषभदेव के परिणामों में निर्मलता आने से केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई तब घातिया और अघातिया कर्म भी नष्ट हो गए आचार्य श्री ने बताया कि कर्म बंधन से सभी दुखी हैं हम भी दुखी थे इसलिए संसार के विषय भोगों से विरक्ति के कारण सभी साधु दीक्षा लेते हैं नीलांजना के नृत्य से भगवान को वैराग्य हुआ जीवन नश्वर है , भौतिक सुख भी नश्वर है इसलिए शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए दीक्षा ली जाती है। संस्कार हर व्यक्ति के जीवन में महत्व रखते हैं चाहे परिवार हो सामाजिक क्षेत्र हो धार्मिक क्षेत्र हो या वैराग्य का क्षेत्र हो सभी क्षेत्रों में वैराग्य का महत्व है संस्कारी व्यक्ति जीवन में सफल होता है।

 

ब्रह्मचारी गजू भैया, सक्षम घाटलिया,राजेश पंचोलिया ने बताया कि इसके पूर्व संघस्थ शिष्य मुनि श्री हितेंद्र सागर जी महाराज ने प्रवचन ने बताया कि महापुरुष के आचरण का पालन सामान्य लोग भी करते हैं उसकी मान्यता भी होती है इस कारण प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान आहार पर निकले ताकि अन्य मुनिराज भी अनुसरण कर विधिपूर्वक आहार कर सकें ।संयम और साधना के लिए आहार जरूरी है तभी जीवन चलता है ।मुनि श्री ने बताया कि जब भगवान ऋषभदेव आहार के लिए निकले , वन से नगर में आए घरों के सामने आए तो नागरिकों को समाज को आहार दान विधि का पता नहीं था लोग उन्हें दर्शन के लिए आए भगवान को अनेक प्रकार की सामग्री चाहे वह जवाहरात हो या भोजन सामग्री हो या कोई महंगे द्रव्य हो लेकर कहते थे कि भगवान यह ले लो भगवान ले लो और नहीं लेने पर उनके चरणों में ही अर्पित कर देते थे। मुनि श्री ने बताया कि आज साधु के आने पर आप चौका लगाते हैं पडगाहन करते हैं और नवधा भक्ति पूर्वक साधु का आहार कराते हैं। इससे जो संस्कार आपको मिलते हैं उससे भविष्य में जाति स्मरण होने पर पिछले जन्म के आहार नवधा भक्ति याद आते हैं ।मुनि श्री ने बताया कि तीर्थंकर भगवान को प्रथम आहार देने वाला दाता जीव मोक्ष गामी होता है। इसलिए आप सभी को चौका लगाना चाहिए साधुओं को आहार दान देना चाहिए इससे शाश्वत सुख की प्राप्ति होगी।
धर्मसभा के पूर्व अक्षय तृतीया कारण कालोनी में शोभा यात्रा निकाली गई। श्री ऋषभदेव भगवान जी का पंचामृत अभिषेक विशेष कर गन्ने इक्छु रस से सानंद आचार्य श्री संघ सानिध्य में अभिषेक हुआ।
जीव दया की दृष्टि से तेज गर्मी कारण मूक पक्षियों के लिए मिट्टी के कटोरे पानी भर कर छतो पर रखने हेतु अक्षय तृतीया के अवसर पर वितरित किए गए।
राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी के साथ
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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