पुरुषार्थ और भाग्य एक सिक्के के दो पहलू हैं विज्ञमति माताजी

धर्म

पुरुषार्थ और भाग्य एक सिक्के के दो पहलू हैं विज्ञमति माताजी

पालगंज

पूज्य गणिनी गुरु मां विशुद्ध मति माताजी की शिष्या पट्ट गणिनी आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी ने सम्मेद शिखर तीर्थ पर पहुंचने से पूर्व कहा कि अपने भाग्य पर भरोसा रखते हुए पुरुषार्थ भी करना चाहिए।

उन्होंने कहा की पुरुषार्थ हीन व्यक्ति किसी दीन का नही है। पुरुषार्थ नहीं करेंगे तो भाग्य भी किसी काम का नही, लेकिन पुरुषार्थ के आगे भाग्य छोटा है। परंतु भाग्य भी आवश्यक है क्योंकि भाग्य बिना हम कुछ नहीं कर सकते।

 

 

 

 

उन्होंने पुरुषार्थ और भाग्य को एक सिक्के के दो पहलू बताया उन्होंने सीख दी की हमें हमेशा पुरुषार्थी बनना है। और कभी भी हमें हार नहीं माननी जब तक मंजिल न मिले। आज ठोकर खाओगे कल फिर चल पड़ोगे। यह उसी का फल है कि हम गुरु मां विशुद्ध मति माताजी के चरणों में बैठकर 1300 किलोमीटर की यात्रा की संपन्नता कर रहे हैं। उन्होंने कहा अभी यात्रा पूरी नहीं हुई है अभी आधी यात्रा हुई है। और अभी यात्रा का प्रथम चरण पूरा हुआ है। प्रथम चरण शिखरजी, द्वितीय चरण यहां से चतुर्मास कर तृतीय चरण में सोनागिर जी ।

आज गुरुमाँ ससंघ ने पालगांज स्थित मंदिर में विराजमान चतुर्थ कालीन जिन प्रतिमा के दर्शन भी किए। कल शाम गुरुमाँ सम्मेद शिखर पहुंचेंगी।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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