जो आध्यात्मिक ज्ञान रूपी अमृत पीता है वह मानसिक शारीरिक सभी रोगों से दूर होता है। आचार्य कनकनंदी
भीलुड़ा
स्वाध्याय तपस्वी वैज्ञानिक श्रमणाचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने भीलुड़ा शांतिनाथ जिनालय में अंतरराष्ट्रीय वेबीनार को संबोधित करते हुए बताया कि तीनों लोकों में तीनों कालों में स्वाध्याय परम तप हैं। अनंत काल से अनंत जीव कुज्ञान से आच्छादित हैं। अतः दुख रुपी ज्वाला में मोही जीव संतप्त हो रहे हैं अनंत जीवो के अनंत दुखों को दूर करने की योग्यता जिनवाणी को छोड़कर किसी में नहीं हैं। अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान रूपी सूर्य से ही दूर किया जा सकता हैं। ज्ञान के बिना समस्त जगत तथा स्वर्ग के देव भी अंधकार युक्त हैं।
पूज्य श्री ने कहा स्वाध्याय का ज्ञान अमृत है जो चेतना के माध्यम से आत्मा तक पहुंचता हैं। इंद्रिय रूपी मृग को बांधने के लिए ज्ञान रूपी संयम आवश्यक हैं। जो भावों को मलिन करें संकीर्ण करें वह धर्म नहीं है। गृहस्थ मोह से ग्रसित होकर घर के कार्य व्यापार आदि कार्य करते हैं वैसे ही साधु को भी उस में लिप्त करना चाहते हैं। जबकि साधुओं का नव कोटि से त्याग होता है। अनंत दुखों को शांत करने के लिए अनंत वैभव को प्राप्त करने के लिए स्वाध्याय है। आलस्य प्रमाद तनाव संक्लेश निंद्रा को कम करके स्वाध्याय किए बिना ज्ञान स्थिर नहीं होगा।
तनाव दूर होने पर ग्रहण करने की क्षमता बढ़ेगी तथा याद रहेगा। केवल बुद्धि लब्धि से सफलता नहीं मिलती हैं। जो आध्यात्मिक ज्ञान रूपी अमृत पीता है वह मानसिक शारीरिक सभी रोगों से दूर होता है। इसके लिए राग द्वेष दिखावा आडंबर सब कम करना चाहिए। पाथ ऑफ रिलीजन इज पीस एंड हैप्पीनेस। मैं अनंत शक्तियों का पुज हू अनंत ज्ञान का पुंज हू ऐसा आध्यात्मिक ज्ञान होने पर शंका कुशका सब दूर होती हैं। मेरी मृत्यु कभी भी संभव नहीं है। शरीर में व्याधि होती है आत्मा में नहीं। मैं आकाश से भी अनंत हूं। मै नहीं पुरुष नहीं बालक नहीं युवा नहीं बुड्ढा इससे परे मेरी आत्मा अजर अमर हैं। आत्मा का कभी जन्म नहीं होता कभी मरती नहीं है। ऐसा भाव होने पर शंका नहीं रहती ऐसा दृढ़ निश्चय करके चंचलता कम करके आकर्षण विकर्षण से रहित निडर होकर ज्ञानात्मक झाड़ू से शरीर के अंदर कषायो की सफाई करनी होगी तब मन स्थिर होगा।
विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
