धर्मात्मा वह है जो विपरीत परिस्थिति में भी अपनी क्षमता को ना खोए उसे खंडित ना होने दें प्रसन्नसागर महाराज
पारसनाथ
पूज्य अंतरमना प्रसन्नसागर महाराज ने सिद्धायतन में हो रहे पंचकल्याणक महोत्सव में अपनी पीयूष वाणी से कृतार्थ करते हुए कहा कि धर्मात्मा तो तो वह है जो विपरीत परिस्थिति में भी अपनी समता को न खोए उसे खंडित ना होने दें। जो शब्द संत व सत्संग बुद्धि को स्पर्श करते हैं वह हृदय परिवर्तन नहीं कर सकते। बल्कि जो शब्द से हृदय छू जाए बस वही स्वाध्याय हैं। इसीलिए भगवान बनने का मार्ग ग्रहण करने का नहीं छोड़ने का सहन करने का समता रखने का मार्ग है। अपनी वाणी से ऐसा कोई शब्द नहीं कहो जिससे सामने वाले के परिणाम विपरीत हो जाएं। वाणी की मिठास ही जीवन की उज्जवलता है। क्योंकि शब्दों की चोट आदमी कभी नहीं भूल पाता है। शास्त्र में लिखा है की मीत और प्रीत वचन बोलो। आज हम कहना चाहते हैं कि आने वाले समय में प्रसन्नसागर का संघ एक आदर्श संघ के रूप में जाना जाएगा।
महाराज श्री ने आगे कहा कि तुम्हारी शान बढ़ जाती रुतबा बढ़ गया होता जो तुमने गुस्से में कहा अगर हंस के कह दिया होता तो इंसान को गर्म होने में वक्त नहीं लगता लेकिन ठंडा होने में पूरी जिंदगी लग जाती है।



उन्होंने कहा सभी को मेरी बुलंदी दिखाई दे रही है किसी ने मेरे पैर के छाले नही देखे। हमने उपवास की साधना कैसे की है यह हम और हमारा परमात्मा जानता है। पारसनाथ स्वामी ने यह पद पाने के लिए बहुत उपसर्ग सहन किए हैं। जब जाकर कुछ पाया है इसीलिए ध्यान रखना शिखर की ऊंचाई पानी है तो सहन तो करना पड़ेगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
