अंतिम लक्ष्य सल्लेखना होना चाहिए आचार्य श्री विद्यासागर महाराज

धर्म

अंतिम लक्ष्य सल्लेखना होना चाहिए आचार्य श्री विद्यासागर महाराज
डोंगरगढ़
विश्व वंदनीय आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने जीवन के यथार्थ सत्य को बताते हुए कहा कि अंत भला हो तो, सब भला होता है मनुष्य की गति उसकी मति पर निर्भर करती है।
आचार्य श्री ने कहा कि पिछले 2 से 3 दिनों के बीच आते जाते समय गाय को देखा तो बहुत ही स्थान पर बैठी हुई थी। जब मैंने देखा तो वह उसी स्थान पर बैठी हुई थी। कल देखा तो वह लेटी हुई थी। इसका मतलब कुछ गड़बड़ है, पास जाकर देखा तो वह आंखें झपक रही थी, तो पता चला कि अभी जीवित है। और आज उसका अवसान हो गया।

 

 

 

 

पूज्यश्री ने आशय समझाते हुए कहा कि पशुओं को भी मृत्यु का आभास हो जाता है, उसने भी अपनी मृत्यु के पूर्व खाना, पीना त्याग कर दिया था। सब लोग उसके सामने खाने पीने की वस्तुएं रख दिए फिर भी उसने कुछ नहीं खाया। इसी प्रकार मनुष्य को भी अपने अंतिम समय में सल्लेखना पूर्वक मरण करना चाहिए। अंत भला तो सब भला। मनुष्य का जितना आयु का बंध होता है वह इतनी समय तक जीवित रहता है। उदाहरण के माध्यम से समझाया जिस प्रकार पेन में जितनी स्याही भरोगे उतना वह चलती है, और जब स्याही खत्म होने लगती है तो धब्बा आने लगता है। इसमें और स्याही भर लो। इसी प्रकार मनुष्य में जब तक प्राण हैं तब तक उसकी सांसे चलती है और सांसे रुकते ही उसके प्राण निकल जाते हैं। मनुष्य की गति उसकी मति पर निर्भर करती है। जैसी होगी गति, वैसी होगी मति। मनुष्य अपने कर्म परिणाम और मती से चारों गलियों में से किसी भी गति में जा सकता है।

उन्होंने कहा कि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भाव का भी इस पर प्रभाव पड़ता है, इसलिए सभी का अंतिम लक्ष्य सल्लेखना होना चाहिए। जिससे अगले भव में सद्गति प्राप्त हो। और तीन से सात भव के बाद फिर तो मोक्ष प्राप्त हो सकता है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी

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