अंतरंग में जो जितना ज्ञानी होगा वह अधिक सरल सहज होता है आचार्य कनकनंदी
भीलूडा
सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि जहां वैमनस्य, विरोध है, वहां झंझट है, मानसिक आतंकवाद है। पंचकल्याणक, विधान, पूजा विनय का छोटा रूप हैं। उन्होने कहा जो विनम्र होते है, वह सरल सहज होते हैं, मूर्ख नहीं होते हैं। अंतरंग में जो जितना ज्ञानी होगा वह अधिक सरल सहज होता है। एक उदाहरण देते हुए कहा गन्ने को चुस कर, रस निकालकर खाया जाता है। छिलका सहित खाने पर मुंह छिल जाता है, वैसे ही आगम का श्रद्धान, अनुकरण नहीं करते हैं, स्वार्थ के अनुसार चलते हैं, यह अविनयी होते हैं, वक्र रहते हैं।
आचार्य श्री ने कहा जो तुम्हारे श्रेय के लिए कारण है वह तुम करो। अभिमान त्याग करके मार्दव गुणों को ग्रहण करना चाहिए। मेरे द्वारा ही मैं भगवान बनु। ऐसे भावो को रखना चाहिए। अनादिकालीन कुसंस्कार 1 दिन में नष्ट नहीं हो सकते। जो ज्ञाता होगा, जो अन्य के गुणो को अतिशय से ग्रहण करेगा, प्रकाशन करेगा, दूसरों के महात्म्य को नव कोटि से स्वीकार करेगा, आध्यात्मिक ज्ञान को प्रकाशित करेगा वह मृदु तथा सरल होगा। जो आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाशन नहीं करता है, नव कोटि से दूसरों के आध्यात्मिक गुणों से प्रसन्न नहीं होता है, गदगद नहीं होता है, प्रशंसा नहीं करता है वह कुटिल होता है।
उन्होंने कहा लाल चश्मा पहनने पर सब लाल दिखाई देता है, वैसे ही अभिमानी को सब मेरा ही मालूम होता है। अभिमान से एक आत्मप्रदेश में अनंतानंत पाप बंध होता है। जिससे बेड हारमोंस का स्त्राव होता है। जिससे मस्तक भारी रहता है। पुण्य क्रियाएं हल्का,लाघव अनुभव कराती है। प्रह्लाद का अर्थ प्रकृष्ट सुख है
जो विनम्र, सरल सहज होते हैं वह प्रह्लाद से युक्त आल्हादित
आनंदित होते हैं धर्म आत्म साक्षी पूर्वक होता है, स्वयं अनुभव होता है। खोटा भाव होने पर मन चंचल होता है संतुष्टि नहीं होती है कितना भी सुख हो शांति नहीं होती।
आचार्य श्री ने आगे बोलते हुए कहा विज्ञा हिंगाष्टक चूर्ण है। विज्ञान से आनंद होता है। एलआगम ज्ञान से अद्भुत आनंद प्राप्त होता है। दूसरे के गुणों को विनम्र ही ग्रहण करता है। गुण का आदर प्रशंसा करने पर ग्रहण होगा। जिससे आत्मा में प्रह्लाद होता है प्रसन्न होता है वह धर्म है। जो अविनय उदंड है उच्छृकल है उससे कोई सुखी नहीं होगा।, वह सभी को दुख ही देगा ,भले कानून उसे दंड नहीं भी दे परंतु स्वयं में वह दुखी ही रहेगा। विनयी इस लोक और परलोक दोनों में सुखी होगा।
विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
