जब आत्मा मरती नहीं है तो डर किस बात का… प्रसन्नसागर महाराज
गिरिडीह
जब आत्मा मरती नहीं है तो डर किस बात का ग्रंथ में लिखे इस
वाक्य ने मुझे इस साधना में बहुत संबल दिया।इतने बड़े पहाड़ पर कोई नहीं बस जहां हम, हवा और हमारी परछाई थी। इस साधना केदौरान एक बात जाना कि धर्म ही अकेला है,और कुछ नहीं। इस व्रत की साधना अभ्यास 7 वर्षों से कर रहा हु, तब जा जाकर इसे करनेलायक बना हूं। यह साधना मैं नहीं कर रहा यह मेरे गुरु काआशीर्वाद है।
ये बातें तपस्वी संत तपस्वी संत अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज ने सिंहनिष्क्रीडित व्रत का 557 दिनोंके उपवास व अखंड मौन व्रतसाधना के सफल समापन के बाद महापारणा महोत्सव के दौरान शनिवार को कही। जैन धर्म के सबसे बड़े तीर्थ सम्मेद शिखर जीमें उपस्थित भक्तों को संबोधितकर रहे थे। उन्होंने कहा कि यहसाधना मैंने अपने को निखारने के
लिए की है।
संभव सागर महाराज के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए भावुक हुए आचार्य श्री
पूज्य पूज्य आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज ने अपनी परंपरा के आचार्य संभव सागर महाराज के वात्सल्य भाव के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की तो वह भावुक हो उठे। उनका बखान करते हुए उनकी आंखें करुणा से भर गई। इसे देख भक्तो का भी जय गो सुनाई देने लगा। भक्ति भाव विभोर हो गए। सभी की आंखों में आंसू थे और सभी भाव विभोर नजर आए।
वातावरण इस तरह का बना हुआ था कि सभी गुरुदेव की एक झलक पाने को आतुर दिखाई दे रहे थे। देश के
पहले दिगंबर जैन सन्त है, जिन्होने शाश्वत तीर्थ राज सम्मेद शिखर जी के स्वर्णभद्र पारस नाथ टोंक की गुफा में
557 दिनों की साधना की।
अपनी सफल साधना के बाद जब अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागर महाराज स्वर्णभद्र कूट से मधुबन पधारे तो उनकी एक झलक पाने को सम्पूर्ण मधुबन निवासी सहित देश विदेश के भक्त पलक पावड़े बिछाए मार्ग में खड़े थे। बैंड-बाजे ढोल नगाड़े के साथ सांस्कृतिक नृत्य करतेआदिवासी समुदाय के कलाकारों ने उपस्थित जनमानस का मन मोह लिया। मधुबन वासियों ने पूज्य गुरुदेव का गर्मजोशी से स्वागत किया। महाराज पंडाल पहुंचे, जहां 557 दिनों के अखंड मौन के बाद उनकी दिव्य ध्वनि निखर कर भक्तों लिए आई।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
