आज के समय में मन को स्थिर करना सामान्य बात नहीं है गुणमति माताजी
सागर
आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज की परम प्रभावक शिष्या आर्यिका 105 गुणमती माताजी ने अंकुर कॉलोनी में धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आज के समय में मन को स्थिर करना कोई सामान्य बात नहीं है। उन्होंने इस पर विशेष प्रकार डालते हुए कहा कि पूर्व में भगवान बाहुबली ने 1 वर्ष तक और भगवान महावीर स्वामी ने 12 वर्ष तक एवं युग प्रवर्तक प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान को अपने चित्त और मन को स्थिर करने में 1000 वर्ष तक लग गए थे।
उन्होंने जोड़ देते हुए कहा कि मोक्ष की चर्चा करना और मोक्ष पथ पर चलना दोनों अलग-अलग हैं। उन्होंने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का जिक्र करते हुए कहा कि आचार्य श्री कहते हैं कि ध्यान की बात करना और ध्यान से बात करना दोनों में बहुत अंतर होता है। आचरण हमारे कदम जैसे होते हैं और मोक्ष की चर्चा आंख के समान होती है। माताजी ने कहा कि आंख से हम दूर तक देख सकते हैं परंतु पैरों से वहां तक पहुंचने में बहुत समय लगता है। उदाहरण के माध्यम से बताया कि हम जमीन पर खड़े होकर चांद तो देख सकते हैं, परंतु चांद पर पहुंचने में बहुत समय लगेगा। आचार्य श्री नेमीचंद ध्यान को परिभाषित करते हुए बताया है कि किसी भी प्रकार की चिंता मत करो, बोलो मत, चेष्टा मत करो, विचार नहीं करना इस प्रकार से जियो की अपनी आत्मा को आत्मा में स्थिर करो यही ध्यान कहलाता है।
माताजी ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के एक संस्मरण को बताते हुए कहा कि इस विषय पर आचार्य श्री ने बीना बारहा मैं बताया था कि लगभग 80% बीमारियां हमारे कलुषित परिणामों के चिंतन से होती है। जबकि 20% बीमारियां कर्म के उदय से होती हैं। माताजी ने संदेश देते हुए कहा कि हमें अपने परिणामों को संभालना है। समय चलता नहीं दौड़ता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
