राष्ट्रीय सन्त गौरव आचार्य वर्धमान सागर महाराज का रजवास होते हुए पीपलू मे हुआ मंगल प्रवेश15 जनवरीसे 18 जनवरी तक संभावित प्रवेश किशनगढ़

धर्म

राष्ट्रीय सन्त गौरव आचार्य वर्धमान सागर महाराज का रजवास होते हुए पीपलू मे हुआ मंगल प्रवेश15 जनवरीसे 18 जनवरी तक संभावित प्रवेश  किशनगढ़

निवाई

प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की पट्ट परम्परा के शिष्य सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में वात्सल्य वारिधि आचार्य वर्धमान सागर महाराज संध का सन्त निवास नसियां जैन मंदिर से गाजेबाजे के साथ गाँव रजवास बगड़ी पीपलू लावा होते हुए किशनगढ़ के लिए मंगल विहार हुआ। आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज अपने संध सहित निवाई से विहार करके रजवास बगड़ी पीपलू लावा होते हुए किशनगढ़ पहुचेंगे।

 

 

जैन समाज के प्रवक्ता विमल जौंला ने बताया कि विहार से पूर्व सुबह श्रद्धालुओं ने मूलनायक भगवान शांतिनाथ के अभिषेक कर शांतिनाथ की शांतिधारा की एवं पूजा अर्चना की। जैन धर्म प्रचारक विमल जौंला ने बताया कि आचार्य श्री बुधवार को गाँव बगड़ी से गाजेबाजे से मंगल विहार करके सड़क मार्ग से पद विहार होते हुए पीपलू पहुंचे जहाँ समाज के श्रद्धालुओं ने पादप्रक्षालन एवं आरती कर अगुवानी की। पीपलू पहुंचकर आचार्य श्री संध ने जैन मंदिर में जिनेन्द्र देव के दर्शन किए। पीपलू जैन समाज के श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के समक्ष श्री फल समर्पित कर आशीर्वाद लिया।

 

 

 

जौंला ने बताया कि रजवास गांव में मंगल प्रवेश के दौरान सेकडों महिला पुरुषों ने गाजेबाजे के साथ अगवानी की। जिसमें बडौदा राजस्थान क्षेत्रीय ग्रामीण बेंक के शाखा प्रबन्धक पंकज कुमार जैन देवेन्द्र आण्डरा पालिका उपाध्यक्ष जितेंद्र जैन पवन बोहरा सुशील गिन्दोडी राजकुमार जैन अमित कटारिया सुनील गिन्दोडी अशोक भाणजा नरेश बडा़गांव अनिल भाणजा शंभु कठमाणा महेन्द्र चेनपुरा सत्यनारायण मोठूका विमल सोगानी सहित सेकडों लोग मौजूद थे।

इस अवसर पर राष्ट्रीय संत आचार्य वर्धमान सागर महाराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि संसार का प्रत्येक प्राणी सुख शांति की प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील है। उसका प्रत्येक चरण आनंद की प्राप्ति हेतु गतिशील है किन्तु आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जितना वह शांति के सोपानों पर आरुढ़ होना चाहता है उतना ही प्रतिकूलताओं की ठोकरें खाकर अध: पतित हो जाता है। उन्होंने कहा कि जितनी सुख की आकांक्षा करता है उतना ही दुख की ज्वालाओं मे झूलस जाता है यहि कारण है कि आज मानसिक विक्षिप्तता जैसी व्याधियां वृद्धि गत हो रही है एवं मानव जिंदगी को भार की तरह ढो रहा है। उन्होंने कहा कि इन विषम परिस्थितियों में भी सुख शांतिमय सुमनों की सुरभि से स्व पर को सुरभित करने अन्तर्मन मे आनंद की लहर लहराने और जीवन धरा पर साम्य परणति का चमन महकाने हेतु गुरुओं के वचनामृत ही समर्थ है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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