खुद से अधिक किसी पर विश्वास मत करो क्योंकि अंधेरे में परछाई भी साथ छोड़ देती है निर्दोष सागर महाराज
विदिशा
मुनि श्री निर्दोष सागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि स्वाध्याय एक ऐसी बस्तु है जो खुद का परिचय खुद कराती है। जंहा घनघोर अंधेरा होता है वंहा आपकी परछाईं भी आपके साथ नहीं चलती है,ऐसे घनघोर अंधेरे में यदि आप ऐसा दीप जला लेते है जो किसी आंधी और तूफानों में न बुझ सके तो वह दीप हें। स्वाध्याय का दीप जो कि एक बार प्रज्वलित हो जाऐ तो वह फिर बुझता नहीं।
मुनि श्री ने कहा कि “बुझते है वह दीप है जो दीप से दीप जला करते है हम तो आचार्य गुरूदेव विद्यासागरजी महाराज के वह दीप है जो एक बार प्रज्वलित हो गये तो हो गये वह फिर कितने भी झंझावात आ जाऐ यह दीप वुझने वाला नही। मुनि श्री ने कहां की यदि आप अपने आचरण को सुरक्षित रखना चाहते है तो श्रावकाचार का स्वाध्याय रोज करना चाहिये। जिसके माध्यम से आपको तत्वों का ज्ञान होता रहे, जब तक आप किसी वस्तु के गुण दोष को नहीं जानेंगे तब तक आपका ज्ञान अधुरा ही है। “गुण ग्रहण का भाव रहे नित दृष्टि न दोषों पर जावे” गुण ग्रहण का भाव आपके अंदर तभी आ सकता है,जब आप जैन सिद्धांत को पड़ते है “वंदे तदगुण लब्धये” जो मोक्षमार्ग का नेता हो,कर्म रूपी पर्वतों का भेत्ता हो, वस्तु तत्व का ज्ञाता हो वही सर्वज्ञ कहलाता है।
मुनि श्री ने क्रोध मान माया लोभ की चर्चा करते हुये कहा कि क्रोध अंधा होता है,मान बहरा होता है, और माया गुंगी होती है। लोभ नकटा होता है, क्रोध के आवेश में व्यक्ति अपने आप को और अपने श्रद्धान को खो देता है मानी व्यक्ती कभी किसी की नहीं सुनता और माया अक्सर अवसर ढूंढत है, लोभी व्यक्ती लोभ में आकर कोई भी अनर्थ कर सकता है।
मुनि श्री ने कहा कि यह दुनिया बहुत त दुरंगी है। एक राजा का कथानक सुनाते हुये कहा कि जिस व्यक्ती के पास तत्वों का अध्यन होता है वह अपने परिवार का नायक होता है। आपकी चर्या और आचरण को कितने लोग पसंद करते है यह परिक्षण आप स्वं खुद से करते रहो यदि आपके व्यवहार से आपका अपना परिवार आपके मिलने बाले लोग आपके रिश्तेदार खुश नहीं है तो यह आपकी अपनी कमी है। उसका परिक्षण आपको खुद करना होगा। तभी आप जगत में लोक प्रिय बन सकते है। जो व्यक्ती अपने आपको खुश रखते है तो वही व्यक्ती दूसरों को खुश रख सकता है। मुनि श्री कहा यदि आपके बच्चे आपकी पत्नी आपसे छुटकारा पाने की कोशिश कर रहे है तो आप अपने परिवार के नायक नहीं हो सकते। यदि आपके बच्चे आपकी बात नहीं मान रहे है तो कहीं न कही आपकी अपनी कमी है। मुनि श्री ने कहा कि हर किसी को प्रसन्न और खुशी रखना किसी महापुरुष का काम हो सकता है। लेकिन आप यह कोशिश तो कर सकते है कि आपकी अपनी दिनचर्या में आपका किसी से भी दुर्व्यवहार न हो। उपरोक्त जानकारी जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने दी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
