दान देने से लोभ हिंसा कम होती है आचार्य कनकनंदी

धर्म

दान देने से लोभ हिंसा कम होती है आचार्य कनकनंदी
भीलूडा
निर्ग्रंथ आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने शांतिनाथ जिनालय भीलूड़ा में अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि अनादिकालीनमोह,मिथ्यात्व,
लोकमूढताआदि के कारण यह जीव सांसारिक परिग्रह, परिवार आदि को त्याग नहीं पाता है। दान देने से लोभ तथा हिंसा कम होती है जैसे सूर्य उदय से पहले लालिमा दिखाई देती है दान देने से भाव परिवर्तन ऋतु परिवर्तन की तरह होते हैं। दान से साधर्मी धर्म में स्थित होते हैं।

 

उन्होंने बताया की जब उत्तर भारत में अकाल पड़ा तब भद्रबाहु स्वामी 12000 साधुओं को लेकर दक्षिण भारत गए। सेठ का जीव पानी पानी करते हुए मरने पर मेढक बना परंतु वही मेंढक भगवान की पूजा भक्ति की भावना से कमल की पंखुड़ी लेकर जाते हुए श्रेणिक राजा के हाथी के पैर के नीचे दब जाने से मर गया तो देव बन गया। धन के प्रति अधिक आसक्ति रखने वाले जीव सांप सूअर आदि बनते हैं। दान देने से जिन शासन की प्रभावना होती है। दान नहीं करने वाला हिंसक, लोभी है। दान देने वाले में प्रेम, वात्सल्य, सरलता, पवित्रता, मृदुता, उदारता, लोकप्रियता आदि होते हैं। जो दान नहीं देते हैं उनमें क्रूरता अधिक होती है। दान देने से धर्मतीर्थ की स्थापना होती है। धर्म तीर्थ से जीव जिनेंद्र बनता है, जीव की उन्नति होती है। विदेशों में व्यावहारिक दृष्टि से नैतिक गुण भारत से अधिक हैं।

उन्होंने बोलते हुए कहा की दान से परोपकार की प्रवृत्ति बढ़ती हैं, आनंद आता है। परोपकार करने वालों में टेशन, मानसिक, शारीरिक रोग दूर होते हैं। धन नश्वर है इसलिए दान करके उसका सदुपयोग करना चाहिए। जिससे भावों की उत्कृष्टता होती हैं, आत्मा की विशुद्धि होती है। जो साधु की आवश्यकता जानकर देख कर भी उनकी सेवा नहीं करते हैं वह लौकिक मनुष्य , नागरिक, सामाजिक प्राणी भी नहीं है। दान का हर धर्म मे वर्णन हैं। मनुष्य मनुष्य रूप में आतंकवादी क्रूर प्राणी है। मनुष्य पेड़ बिना भोजन ऑक्सीजन कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते कुछ घंटों में ही मर जाएंगे। दान नहीं देने वाले को पूर्वाचार्य भी बार-बार धिक्कार रहे है। स्व कल्याण के लिए त्याग हैं। दान अलौकिक व्यवस्था हैं। दान को दिखावा, बंधन बोली, से करने पर पुण्य नहीं प्राप्त होता है।

 

 

 

 

वही वेबनार में मुंबई से पंडित पंकज जैन ने बताया कि सांसारिक जीव राग द्वेष , विषय कषायो के कारण पाप कार्यों से निवृत्त नहीं होता है। श्रीपाल जैन भीलुड़ा वालों ने बताया कि हम यहां के लोग निवृत्ति का वास्तविक धार्मिक अर्थ नहीं जानते थे। सेवानिवृत्ति केवल प्रयोग करते हैं। परंतु आध्यात्मिक किन कार्यों को करने में प्रवृत्त होना चाहिए तथा सांसारिक कार्यों से निवृत होना चाहिए यह कुछ जानते नहीं थे। आचार्य श्री के पास पढ़ने से अनेक शब्दों का गूढ़ रहस्य ज्ञात हो रहा है।

विजय लक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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