विनय मोक्ष का द्वार है कनकनंदी गुरुदेव
भीलुड़ा
ज्ञान विज्ञान दिवाकर आचार्यश्री
कनकनंदी गुरुदेव से भीलुड़ा में शांतिनाथ मंदिर में अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि ग्रंथ लेखन करने वाले साधु विहार व पंचकल्याणक करने वालों से अधिक श्रेष्ठ है। आत्म ध्यान करने वाले साधु ग्रंथ लेखन करने वालों से भी श्रेष्ठ है। शुभ उपयोग न करने पर अशुभ उपयोग ही होगा पंचम काल में शुद्ध उपयोग नहीं होता अतः शुभ उपयोग में ही रहना चाहिए। ध्यान अध्ययन नहीं करने वाले साधु जिनवाणी का, भगवान की दिव्य ध्वनि का पालन नहीं करते हैं। धर्म ध्यान आत्म चिंतन, नग्न रहने, केश लोच करने से भी श्रेष्ठ है। मन को स्थिर रखना विष पीने से भी कठिन है।, करते थे। ज्ञान में ज्ञान के उपकरण शास्त्र आदि में तथा ज्ञानवंत पुरुषों में भक्ति के साथ नित्य जो अनुकूल आचरण किया जाता है वह ज्ञान विनय है। ज्ञान के साथ-साथ उससे संबंधित उपकरण और ज्ञानवान पुरुष भी विनय के पात्र हैं। इन सब की विनय करना ज्ञानविनय है। भगवान की मूर्ति के बराबर जिनवाणी का स्थान है। जिनवाणी के अविनय से भगवान की मूर्ति का अविनय करने के बराबर पाप लगता है। जिनवाणी की प्रशंसा को भी गलत मानना पाप है। जिनवाणी की प्रशंसा करना अनिवार्य है। साधु के लिए मुख्य जिनवाणी है। आचार्य श्री हमें ज्ञानामृत भोजन से अनंत भव सुखी होने का उपाय बता रहे हैं। भक्ति के साथ अनुकूल आचरण करें। जिनवाणी का अनुकूल आचरण किया जाए यही ज्ञान का विनय है। सही समय में स्वाध्याय करना काल विनय है। जिनवाणी पढने में भी विनय व शुद्धि होना आवश्यक है।
जितना है उससे भी अधिक सम्मान देना बहूमान है। जिनवाणी मां है उसको हमारी मां से भी अधिक सम्मान देना चाहिए। उसके माध्यम से हम पाप क्रियाओं से बच सकते हैं।
आचार्य श्री कहते हैं पाप क्रियाओं को तो छपाकर ,प्रदर्शन करके दिखावा करके किया जाता है तो जिनवाणी तो अनंत उपकारी है उसको छपाना, प्रकाशित करना, एक दूसरे को ज्ञान देना कैसे गलत हो सकता है। विनय मोक्ष का द्वार है। विनय से संयम, तप, ज्ञान होता है। जो विनयवान नहीं है उसका ना तप है ना दान ना संयम ना धर्म हैं।
श्रद्धा पूर्वक, ज्ञानपूर्वक, विवेक पूर्वक विनय से आनंद आता है। विनय पूर्वक चार प्रकार का दान नहीं देने वाला लोभी है, हिंसक है। ज्ञान का, शिक्षा का फल विनय हैं । विनय बिना विद्या भी प्राप्त नहीं होती।विनय बिना विद्या भी घातक हो जाएगी। विनय से विद्या का तथा दान के फल का गुणात्मक विकास होता है। विनय से दक्षता, निपुणता, उदारता, विशालता, विपुलता आती है। जिससे प्राणियों का हित होता है।
मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता” जब तक मुझे अनंत ज्ञान ना होगा मैं सर्वज्ञ नहीं बनूंगा” इस कविता के द्वारा मंगलाचरण किया।
विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलित अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
