परिवार परिग्रहो से ममत्व छोडकर दीक्षा ग्रहण की जाती है कषायों और शरीर का क्रश करना सल्लेखना है।
आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी
कोपर गांव (महाराष्ट्र)
मानव जीवन और मरण के बीच
अपना जीवन व्यतीत करता है।
जीवन में क्या किया है। जीवन कैसे बिताया है यह परीक्षा है। तथा सल्लेखना उस परीक्षा का परिणामफल है। कषाय
मानव की सबसे बड़ी शत्रु है। कषाय और शरीर की क्रश करना, कषायो को मंद करके कम करना सल्लेखना है। यह प्रेरक उदबोधन वात्सलय वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी ने कोपरगाँव महाराष्ट्र की धर्म सभा मे प्रकट किये।
पंचम पट्टा धीश आचार्य श्री ने आगे प्रकाश डालते हुए बताया की मानव परिवार तथा सब तरह के परिगृह में उलझा रहता है व उनके प्रति ममत्व भाव रखता है। दीक्षा के विषय मे कहा परिवार और परिग्रहों से ममत्व को
हटाकर दिगम्बर दीक्षा ग्रहण की जाती है।
सल्लेखना पर विशेष व्याख्या
पूज्य महाराज श्री ने सल्लेखना पर विशेष व्याख्या करते हुए कहा, कुछ वर्ष पूर्व संथारा सल्लेखना को आत्म हत्या , अपधात जैनेतर मानते थे
सल्लेखना अंतर्गत साधु यम और
नियम सल्लेखना के माध्यम से निर्यापकाचार्य दीक्षा आचार्य श्री गुरु से शरीर की स्थिति को देख कर नियम सल्लेखना निश्चित अवधि की लेते हैं। जिसमें पहले अनाज कम किये जाते है छह रसों का क्रम से त्याग करते है, एवंम शरीर की क्षमता अनुसार उपवास लेते है। निश्चित अवधि पूर्ण होने की तिथि पूर्ण होने की दिनांक से यम सल्लेखना प्रारम्भ
होती है। जिसमे क्षपक साधु संघ समाज से क्षमा याचना कर आजीवन चारो प्रकार के आहार का त्याग कर देते है।
उदाहारण देकर समझाया
पूज्य गुरुदेव ने आचार्य शान्तिसागर महाराज का उदाहरण देकर समझाया की वर्तमान में हमारे सामने उदाहरण है, प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती
आचार्यश्री शोति सागरजी दक्षिण का जिन्होने 36 दिन सल्लेखना धारण की
गत वर्ष कोथली मे आर्यिका श्री दुर्लभ मति माताजी के 24 दिन तक उपवास यम सल्लेखना में हुए थे। आचार्य ने आगे कहा दीक्षा सल्लेखना के पावन अवसर से मनुष्य के जीवन मे परिणामों में विशुद्धि आती हैं।
वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज संघस्थ आर्यिका श्री महायशमती
संकलन
अभिषेक लुहाड़िया रामगंज मंडी
