श्रावक के लिए आहार दान सबसे श्रेष्ठ दान है। कनकनंदी

धर्म

श्रावक के लिए आहार दान सबसे श्रेष्ठ दान है। कनकनंदी
भीलुडा
स्वाध्याय तपस्वी आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि श्रावक के लिए आहार दान सबसे श्रेष्ठ दान है। आहार दान में अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती है, मन एकाग्र होता है, जब से चौका लगाने का भाव करते हैं तब से पुण्य बंध प्रारंभ हो जाता है।

चौके में सुबह से लेकर जब तक आहार देते हैं तब तक 5 6 घंटे तक धर्म ध्यान होता रहता है। अन्य धार्मिक क्रियाएं इतने समय तक नहीं कर पाते हैं पूजन, अभिषेक, विधान आदि एक-दो घंटे स्वाध्याय भी एक-दो घंटे ही लगातार कर सकते हैं अतः आहार दान में सबसे अधिक धर्म ध्यान होता है। भावों में विशुद्धि रहती है कहीं चौके में लापरवाही ना हो जाए जिससे साधुओं का अंतराय हो सकता है अतः सावधानी पूर्वक हर कार्य किया जाता है।

 

 

 

मुनि श्री ने कहा उत्तम आहार दान उत्तम पात्र साधु को देने से उत्तम भोग भूमि की प्राप्ति होती है, परंपरा से स्वर्ग मोक्ष की प्राप्ति होती है ।योग्य आहार से साधु उत्तम तप, ध्यान, अध्ययन, स्वाध्याय, लेखन, पठन-पाठन करते हैं। जिससे आहार दान मोक्षदान, तप दान , शरीर दान ,औषधी दान आदि भी है। जिस प्रकार वटवृक्ष का छोटा सा बीज अरबो खरबो टन का विशाल वृक्ष बनता है वैसे ही आहार दान देना तथा उसकी अनुमोदना करना महान पुण्य का संचय करना है। आहार दान का पुण्य भाव कर्म,नो कर्म, द्रव्य, क्षेत्र, काल भाव को प्राप्त होता है तो सामाजिक, आर्थिक , राजनीतिक सुख से लेकर आध्यात्मिक सुख भी प्राप्त कर पाता है। मेंढक कमल की पंखुड़ी से भगवान की पूजा करने जा रहा था वह श्रेणिक राजा के हाथी के पैर के नीचे दबकर मर गया तो भी पूजा के भाव से स्वर्ग जाकर भगवान के समवशरण में श्रेणिक राजा से भी पहले पहुंच जाता है। आहार दान से बौद्धिक क्षमता बढ़ती हैं, दरिद्रता दूर होती हैं, भौतिक विकास अधिक होता है। विज्ञान के अनुसार बीज 16 वर्षों तक जंगल जल जाने से दबे रहते हैं फिर बीज पनपता है। कोई भी धन-संपत्ति लाख उपाय करने पर भी 1 दिन में अरबों खरबों गुना नहीं बढ़ सकती परंतु आहार दान के पुण्य से अरबों खरबों गुना सुख संपत्ति बढ़ती है। देव शास्त्र गुरु की पूजा स्तवन से उच्च गोत्र का बंध होता है। भक्ति से सुंदर रुप, स्तवन से कीर्ति बढ़ती है। धार्मिक क्रियाएं करते समय तथा आहार दान करते समय ना क्रोध करना चाहिए, ना अहंकार माया ,लोभ, काम आदि भाव नहीं होने चाहिए।

आचार्य श्री कहते हैं क्रूर हिंसक शेर आदि मे भी मां बनने पर वात्सल्य भाव आने से दूध आता है। गर्भधारण से लेकर प्रजनन के बाद तक गुड डोपामिन का स्राव होने से मां के दूध आता है। आहार दान के आगे पीछे भी शुभ भाव शुभ विचार ही आते हैं अतः आहार दान से सांसारिक सुख से लेकर स्वर्ग मोक्ष प्राप्त होता है।

 

भीलुड़ा के हितेश भैया ने बताया कि हम आहार दान के महत्व को जानते ही नहीं थे कभी धर्म को विज्ञान से जोड़ा ही नहीं , विज्ञान को धन कमाने में ही प्रयोग करते थे उसको धर्म से कभी जोड़ते नहीं थे। पहले यह गलत धारणा थी कि जो अनपढ़, गरीब होते हैं वही साधु बनते हैं। पुनर्वास कॉलोनी के मनीष पंचोरी ने यह बताया कि यथार्थ धर्म आपसे ही ज्ञात हुआ है थोड़ा आहार दान से अनेक गुना फल मिलता है पहले धर्म के मर्म को नहीं समझते थे। अब अनुभव में आ रहा है। श्रीपाल जी भीलुड़ा वालों ने बताया कि कर्म सिद्धांत का सुक्ष्म विज्ञान आपसे ज्ञात हो रहा है। हमने मिथ्यात्व के कारण पढ़ाई नौकरी को ही महत्वपूर्ण माना था परंतु दान छोटा सा छोटे बीज की तरह विशाल फल को प्राप्त कराता है उसका ज्ञान नहीं था। हमारी बुद्धि तीव्र नहीं है परंतु आपकी कृपा से आपके ज्ञान से हम समझ पा रहे हैं। पुनर्वास कॉलोनी की टीना ने बताया कि आपकी शरण में जीना सीख गए हैं। भोजन किस प्रकार करना चाहिए वह भी आपसे ही सीखा है। आपकी स्वाध्याय से सकारात्मक विचार बढे हैं। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने दान सेवा परोपकार से सुख कविता द्वारा मंगलाचरण किया।

विजयलक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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