आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के 50वे आचार्य पदारोहण दिवस पर भाव भीनी अभिव्यक्ति
संतो के संत महासंत महामना आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का 50वा आचार्य पदारोहण दिवस मना रहे है। यह हमारा अनंत पुण्य है को हमने ऐसे महागुरु के काल में जन्म लिया
पूज्य गुरुदेव का जीवन एक संपूर्ण दर्शन को दर्शाता है, जिनका आचरण में जीवो के प्रति करुणा का भाव लक्षित है। साथ ही स्व और पर कल्याण की भावना निहित है। इतना ही नहीं इनकी दिव्य देशना एक सदमार्ग दिखाती है। आप निर्मोही, निष्प्रही, साधना के धनी है। लेकिन गुरुदेव में राष्ट्रीयता के प्रति अगाध श्रद्धा से ओतप्रोत है। यह सचमुच महामना है। इस धरा के साक्षात भगवान है। सचमुच इनके विचारो का संकलन करना छोटी सी अंजुली में सागर को भरने का असंभव प्रयास करने जैसा है|
जब आचार्य ज्ञानसागर महाराज ने अपने आचार्य पद को त्याग अपने शिष्य को गुरु बनाया
यह ऐसे क्षण हैं जो आज भी सभी को प्रेरणा देते हैं वाह एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हैं यह वार किया था 22 नवंबर 1972 अजमेर के नसीराबाद में जब 25000 लोगों की मौजूदगी थी महाकवि आचार्य ज्ञानसागर महाराज के मन में कुछ अनुपम चल रहा था गुरुदेव ने अपने शब्दों में मुनि विद्यासागर महाराज को कहा मेरा शरीर अब शिथिल है अब में आचार्य पद त्याग कर आ आत्म कल्याण करना चाहता हूं मेरे लिए यह करना इस समय सबसे उचित और आवश्यक है
इसीलिए में आज से अपना आचार्य पद आपको प्रदान करना चाहता हूं होना क्या था सभा में मौजूद सभी जन चकित से हो गए और होना भी चाहिए क्योंकि जिस बात को किसी ने दूर-दूर तक अपने मन में नहीं सोचा था क्या कोई गुरु अपना पद त्याग अपने शिष्य को देखा वह आज अपने सामने नेत्रों के द्वारा देख रहे थे लेकिन मुनि श्री विद्यासागर महाराज अपने गुरु की इस बात से एकदम चकित से हो गए उनका हृदय मन मानो ऐसे रो पड़ा हो वे अपने आप को इस हेतु तैयार करने में मुश्किल पा रहे थे लेकिन उन्होंने गुरु और उनकी मन भावनाओं को समझा आगम की आज्ञा गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य मानकर किसी तरह अपने को तैयार किया।
तब एक और वाकया हुआ दूसरा हुआ जिसे देख कौतूहल से भर गया वर्णन था आचार्य प्रवर ज्ञानसागर महाराज ने अपने आसन को त्याग किया और मुनि विद्यासागर महाराज को आसन पर बिठाया तब आचार्य प्रवर ज्ञान सागर महाराज ने सागर महाराज उन्हे अपना गुरु माना उन्होने स्वयं नीचे आसन पर बैठकर उनसे समाधि हेतु आज्ञा मांगी वह शब्द सभी को सभी की आंखों को नम कर रहे थे उन्होंने कहा हे गुरुदेव मैं आपसे समाधि ग्रहण करना चाहता हूं आप मुझ पर कृपा करें जिससे गुरु बने आचार्य विद्यासागर महाराज ने ज्ञान सागर महाराज को उनके प्रति श्रद्धा भाव से सल्लेखना व्रत दिया इन सबको को देख भला किसकी आंखें नम नहीं हो सकती और वही हुआऐसे दुर्लभ क्षण ऐसे पल बहुत कम देखने को मिलते हैं यह पल हमेशा के लिए चिरकालिक है
वर्णन है
हीरे को परख लिया ज्ञान सागर
फिर ऐसा प्रकाश किया कण-कण विद्यासागर
सूरज की ज्योति को दीपक में दिखाऊं कैसे
कण-कण विद्यासागर
हीरे को परख लिया आचार्य ज्ञानसागर
अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
