सागर से सागर मिल बना धर्म वात्सल्य का महासागर –

धर्म

सागर से सागर मिल बना धर्म वात्सल्य का महासागर –
सम्मेदशिखर
जन जन को श्रद्धा विभोर व अहिंसामयी जैन धर्म को गौरव प्रदान करने वाला दृश्य जो धर्म क्षेत्र के संत जगत में हर जगह होना आवश्यक
जिसने भी दृश्य को देखा उस सौभाग्यशाली ने अपने नयन व जीवन को धन्य कर लिया

 

 

 

 

हम जैन धर्मावलंबियो का सबसे पावन पवित्र तीर्थ क्षेत्र श्री सम्मेद शिखर जी जहा पर वर्तमान के सबसे वरिष्ठ वयोवृद्ध महातपस्वी आजीवन अन्न व षट रस त्यागी पूज्य स्थिवराचार्य श्री संभव सागर जी ऋषिराज उत्कृष्ट आत्म साधना मय विद्यमान है। उसी महा तीर्थ पर साधना महोदधि अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी,आचार्य श्री प्रमुख सागर जी,मुनि श्री पुण्यसागर जी,मुनि श्री जयकीर्ति जी,मुनि श्री गुण नंदी जी,मुनि श्री महिमा सागर जी, गणिनी आर्यिका श्री शुभमती माताजी सहित अन्य भी अनेक साधु भगवंत संघ सहित विद्यमान है।

पिछले सवा वर्ष से अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी गुरूदेव पूज्य स्थिवराचार्य श्री संभवसागर जी ऋषिराज से 557 दिनों का सिंह निष्कृडीत व अखंड मौन व्रत का नियम लेकर साधनारत है।

 

 

जब वे इस कठोर साधना का नियम लेने पधारे तब पूज्य स्थिवराचार्य श्री संभवसागर जी भगवंत ने वात्सल्य व अनुमोदन स्वरूप आवश्यक संबोधन प्रेरणा के साथ उनको अपनी पुरानी पिच्छी प्रदान की थी।

अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज लगभग 8 माह तक गिरिराज के स्वर्णभद्र कूट पर प्रवसारत रहे वहा उपवासों के क्रम में जब भी पारणा होता तो तलहटी से स्थिवराचार्य श्री की प्रेरणा व आशीष से मुनि श्री पुण्यसागर जी गुरुदेव सहित ये समस्त साधु भगवंत वैयावृत्ति भावो को संजोए निर्विघ्न पारणा सम्पन्न करवाने पहुंचते थे।

अभी दिनांक 31अक्टूबर को अंतर्मना स्वामी स्वर्णभद्र कूट प्रवास को पूर्ण कर तलहटी में आए तो सर्वप्रथम शिखर जी में विराजित समस्त साधुभगवंतो के समूह के साथ पूज्य स्थिवराचार्य श्री के चरणो की आराधना करते हुए अंतर्मना स्वामी जी ने पूज्य स्थिवराचार्य श्री को नवीन पिच्छिका भेट की।

 

 

अगले दिन प्रातः उपवासों के क्रम में पारणा हेतु अंतर्मना स्वामी जब शिखरजी के 20 पंथी कोठी में पड़गाहन के लिए उतरे तो उनका एक हाथ पिता के समान 56वर्ष से दीक्षित वयोवृद्ध महानतम आचार्य श्री संभवसागर जी भगवंत तो दूसरा भाई के समान मुनि श्री पुण्यसागर जी गुरुदेव पकड़े हुए विधि हेतु ले जा रहे थे। साथ में स्नेह भाव लिए अनेक साधु भगवंतो का समूह*, यह दृश्य उपस्थित हजारों नयनों को गर्व से आनंदित की अनुभूति करा रहा था।

मानो जैसे अंतर्मना स्वामी के एक तरफ आचार्य आदिसागर जी
अंकलीकर तो दूसरी तरफ चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शान्तिसागर जी भगवंत उपस्थित हुए हो।

क्योंकि स्थिवराचार्य स्वामी जो की आचार्य श्री आदिसागर जी अंकलीकर परंपरा में तो वही मुनि श्री पुण्य सागर जी चरित्र चक्रवर्ती आचार्य देव श्री शान्तिसागर जी की परंपरा से दीक्षित वरिष्ठ मुनि है।

शिखर जी की इस पावन धरा पर गुरु परंपरावाद, संतवाद व पंथवाद से हटकर साधु भगवंतो का ये आपसी स्नेह,विनय भगवान महावीर स्वामी की श्रमण कुल को निश्चित रूप से गौरवान्वित कर रहा है।पूज्य स्थिवराचार्य श्री संभवसागर जी ऋषिराज की अदभुद वात्सल्य छत्रछाया व आशीष अनुकम्पा में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी,आचार्य श्री प्रमुख सागर जी,मुनि श्री पुण्य सागर जी,मुनि श्री जय कीर्ति जी,मुनि श्री गुण नंदी जी,मुनि श्री महिमा सागर जी सहित वहा विराजित समस्त साधु संघों का ये विनय स्नेह गुण समस्त जैन जगत के लिए अनुकरणीय है।

वर्तमान में शिखर जी की पावन यात्रा में नजर आने वाला यह अनुपम दृश्य हर यात्री की यात्रा को सफल करता हुआ जीवन में कभी न भूलने वाला अद्वितीय क्षण दे जाता है।

पुनश्च श्री सम्मेदशिखर जी में विद्यमान ऐसे महान संतो के पावन चरणो में कोटि कोटि नमन

-शाह मधोक जैन चितरी से प्राप्त शब्द सुमन

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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