तीर्थ और तीर्थकर श्रमण सँस्कृति के आधार स्तभ है सिद्धान्त सागर जी

धर्म

तीर्थ और तीर्थकर श्रमण सँस्कृति के आधार स्तभ है सिद्धान्त सागर जी
दमोह
तीर्थ और तीर्थंकर श्रमण संस्कृति के आधार स्तंभ है।भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से श्रमण संस्कृति और वैदिक संस्कृति के रूप में दो अलग-अलग धाराएं मैं चली आ रही हैं। श्रमण संस्कृति में व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व की उपासना की जाती है। श्रमण संस्कृति में वैराग्य और
अध्यात्म को अत्याधिक महत्व दिया गया।
उपरोक्त उदगार एलक श्री सिद्धांत सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में दिगंबर जैन धर्मशाला में व्यक्त किए।
इस मौके पर महिला मंडल के द्वारा आचार्य श्री की भक्ति भाव पूर्वक मंगल पूजन की गई दिगंबर जैन पंचायत के अध्यक्ष सुधीर सिंघई कुंडलपुर कमेटी के मंत्री श्रेयांश लहरी प्रचार मंत्री सुनील वेजीटेरियन धार्मिक मंत्री शैलेंद्र मयूर नन्हे मंदिर कमेटी के अध्यक्ष ग्रीस अहिंसा चक्रेश सराफ राजेश हेनौती पत्रकार नरेंद्र बजाज विद्वान प्रदीप शास्त्री श्रेयांश सर्राफ मनीष आउटलुक गुड्डू भैया लोकेश रिंकू भाई आदि की उपस्थिति रही।
जिनवाणी की प्रभावना में सन्तो का अमूल्य योगदान है निश्चय सागर जी
इस अवसर पर एलक श्री निश्चय सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि जिनवाणी की प्रभावना में दिगंबर आचार्यों का मूल योगदान रहा है। ग्रंथ और निर्ग्रन्थ के माध्यम से ज्ञान की यह परंपरा चली आ रही है, जो जिनवाणी का पान करते हैं उनका कल्याण निश्चित होता है।आज का धर्मात्मा कल का महात्मा और एक दिन वह सिद्ध परमात्मा बन जाता है।विचारों से क्रांति आती है, और विचार ही हमें आचार्य बनाते हैं। आचार्य विद्यासागर जी महाराज के गुरु आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज ने कहा था कि संघ को गुरुकुल बनाना और जिन शासन को महिमामंडित करना, वही कार्य आज आचार्य विद्यासागर जी पूर्ण कर रहे हैं।
व्यक्ति के बोलने से पहले उसका व्यक्तित्व बोलता है समता सागर जी
इसके पश्चात अंत में मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने सबके सार को समाहित करते हुए अपने मंगल उद्बोधन में कहा कि व्यक्ति के बोलने से पहले उसका व्यक्तित्व बोलता है। और प्रतिकूल परिस्थितियों में व्यक्तित्व निखर जाता है। विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म की आराधना करना उत्कृष्टता को प्रदान करता है। आज हमें आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की छत्रछाया सभी को प्राप्त हो रही है, यह हम सबका परम सौभाग्य है। दमोह वाले और अधिक सौभाग्यशाली हैं, कि उन्हें कुंडलपुर के द्वार दमोह में रहने के कारण बड़े बाबा के द्वारपाल के रूप में सेवाएं देने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी

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