*आगम वर्णित चार दान की महत्ता -स्वाध्याय तपस्वी वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी गुरूराज की स्वाध्याय कक्षा में उनकी अमृतवाणी के अंश -*
*वट वृक्ष का बीज जो की अत्यंत छोटा सा लगभग 1 ग्राम से भी कम होता है किंतु उसमे अंतरिक रूप से मौजूद जीनम कोड – डीएनए आरएनए जो की जल,वायु व धूप को अवशोषित करते है*
*जिससे एक ग्राम से भी कम छोटा सा बीज बढ़ते बढ़ते अपने से अरब खरब गुना बड़े वृक्ष का रूप लेकर हजार टन भारी अत्यंत विशाल वट वृक्ष तक बना जाता है।*
*ठीक उसी तरह निर्ग्रंथ वितरगी दिगंबर जैन संत को दिया गया आहार,औषध,अभय या ज्ञान दान व ऐसे दान की अनुमोदना उसी वट वृक्ष के बीज के जीनम कोड – डीएनए आरएनए की तरह ही है जो छोटे से बीज को अपने से खरब गुना बड़ा वट वृक्ष बना देते है उसी तरह वह सामान्य छोटा सा लगने वाला दान पुण्य कर्म भी उस जीव के आत्म से बंध होकर चक्रवर्ती,उच्च इंद्र से लेकर अरिहंत सिद्ध तक के पद को प्रदान कर आध्यात्मिक आत्मिक सुख – शांति देता है जो इन👆 चार प्रकार के दान का सुपरिणाम है*
*एवं पंचकल्याणक,विधान,पूजा,मंदिर निर्माण व जिनेद्र प्रतिमा निर्माण आदि दान के संदर्भ में बताया की यह श्रावक द्वारा की जाने वाली एक उत्कृष्ट पूजा है इसका भी पुण्य कर्म बंध होता है।*
*लेकिन चार मुख्य दान की अपेक्षा इन पूजन दान को पूज्य गुरुदेव ने तुलनात्मक रूप से समझाते हुए बताया की जैसे नारियल का बीज जो वट बीज से बहुत बड़ा होता है।एक टेनिस गेंद जितना,उससे नारिलय का पेड़ उत्पन्न होता है,बड़े बड़े नारियल भी लगते है लेकिन वह वट वृक्ष की तरह अत्यंत घना या व्यापक नही होता।*
*उसी तरह पंचकल्याणक,विधान,मंदिर निर्माण,पूजा व प्रतिमा निर्माण आदि कराना पुण्य तो है ही जिससे चक्रवर्ती,इंद्र,महाराजा जैसे वैभव मिलते है किंतु गणितीय भाषा में उन प्रमुख चार दान से मिलने वाले पुण्य की अपेक्षा अत्यंत अल्प है।*
*गुरुदेव ने आगे समझाया की दान तभी फलीभूत है जब वह बिना नाम,ख्याति,प्रसिद्धि व वर्चस्व के चाहत के स्वेच्छा से किया गया हो।*
*पूज्य गुरुदेव ने कहा की वर्तमान में दान के रूप में बोली हावी है जो दान का विकृत रूप है जिसमे आडंबर,दिखावा,प्रदर्शन, अनैतिक धन,दबाव,शोषण व वसूली है।*
*👆उपरोक्त समस्त पूज्य गुरुदेव की स्वाध्याय वाणी से है*
*शब्द सुमन – शाह मधोक जैन चितरी*
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