देवगढ़ क्षेत्र वन्दना (ललितपुर उत्तरप्रदेश)

धर्म

देवगढ़ क्षेत्र वन्दना (ललितपुर उत्तरप्रदेश)
dr अरिहंत जैन की कलम से
हमे देवगढ़ अतिशय क्षेत्र की वन्दना करने के उपरान्त चंडीगढ़ pgi के चिकित्सक डॉक्टर dr अरिहंत जैन ने बताया, वहां जो उन्हे मिला देखा वह उसे सांझा करने से नही रोक
पाए।जो वहां का वर्णन उन्होंने हमें बताया वह बहुत ही अलोकिक है।
27 dec 2021 को परिवार के 17 सदस्यों के साथ रात्रि के लगभग 9 बजे हम सभी श्री क्षेत्रपाल जी जैन मंदिर की वन्दना करते हुए देवगढ़ अतिशय क्षेत्र की धर्मशाला में पहुंचे। मोसम का मिजाज तेज ठंड वाला था।
धर्मशाला प्रबंधन द्वारा हमारे लिए रात्रि विश्राम का समुचित प्रबंध किया,


वन्दना को लेकर उत्साह
हम सभी मे वहा के दर्शन व वदंना को लेकर काफी उत्साह था।तो हम पो फटते ही 28 dec 2021 को जल्द ही तैयार हो गए, वन्दना के क्रम में हमने धर्मशाला के चैत्यालय के दर्शन किये, वहा की अतिप्राचीन उपाध्याय परमेष्ठि की प्रतिमा के दर्शन कर मन भाव विहल हो गया।
मूर्तियों की संख्या जैसा सुना था उनसे कम नही थी
लगभग 7 बजे का समय हो चुका था हम सभी वन्दना के क्रम में बड़े यहाँ से 2km जाकर जेसे ही हम क्षेत्र पर पहुंचे एक अलग ही अनुभव हुआ जैसा सुना था की यहाँ अनगिनत प्रतिमा है, मूर्तियॉ की संख्या उससे कम नही थी। कहा जाता है कि यहाँ इतनी प्रतिमा थी की अगर हर एक वेदी पर एक मुट्ठी चावल भी चढ़ाया जाए तो एक बोरी चावल लगता था।
मूलनायक शांतिनाथ भगवान का अभिषेक
हम सभी ने मूलनायक अतिभव्य आतिशयकारी प्राचीन शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा का दर्शन किया। हम सभी में मौजूद पुरुष वर्ग को भगवान का प्रथम अभिषेक शांतिधारा का शुभ अवसर मिला। बाबा की अलोकिक छटा को हम सभी एक टक निहारते रहे, तेरी प्रतिमा कितनी सुदर तु कितना सुदर होगा।
मूलनायक भगवान का इतिहास


हम सभी के मूलनायक भगवान की प्रतिमा मन में समा गयी, हमने इसका इतिहास जाना खड़गासन मूलनायक शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा सन 862 ईस्वी की है। कोई अतिशयोक्ति नही है की यह हमारी जैन धरोहर के रुप मे है ।
वन्दना की शुरुआत
अभिषेक शांतिधारा के उपरान्त हमने वन्दना का क्रम शुरू किया क्रमवार दर्शन करते हुए अर्घ समर्पित करते हुए हमने वन्दना की प्रकृति की अनुपम छटा का आनंद भला कोन नही लेना चाहता तो वानर भी इस क्रम में आनंद लेते देखे गए। हमने जब सभी प्रतिमाओं का दर्श किया तो भाव भंगिमाए विभिन्न होने पर भी अलोकिक सौम्य मुद्रा लिए हुए है।
भव्य नक़्क़ाशीदार सिहासन,छत्र, यक्ष, यक्षिणी इत्यादि से अलंकृत प्रतिमाएं तीर्थकरों की बाह्य लक्ष्मी का बोध कराती प्रतीत होती है। निश्चित ही दर्शनार्थियों के सम्यक दर्शन दृढ़ करने का निमित्त बनती है।
सुधासागर महाराज महीनों यहाँ रात्रि में ध्यान लगाया करते थे
हम जब दर्शन कर रहे थे हमारे गाइड ने हमको बताया जिनालय के प्रथम तल पर स्थित जिनालय चैत्यालय पर मुनि पुंगव श्री सुधासागर महाराज महीनों रात्रि में जंगली पशुओं के भय के बावजूद ध्यान लगाया करते थे। हमें तो देखने से ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो यह परिसर आज भी मुनि पुंगव के तप की वर्गणाओं से ऊर्जावान बना हुआ है।
मदिरों के बीचों बीच कुछ खंडित प्रतिमाएं बड़ी संख्या में व्यवस्थित रूप से स्थापित है। जिससे जैन इतिहास एवम धरोहर भी दृष्टिगोचर होती है।
संग्रहालय का किया अवलोकन
क्रमवार वन्दना के क्रम में हमने प्रवेश द्वार के समीप संग्रहालय का भी अवलोकन किया। इन सब को देखकर हम जैन संस्कृति की महानता को ह्रदय में समेट रहे थे। औऱ अपने को गोरवान्वित अनुभव कर रहे थे। यहां के जिनालय अनूठे एवम दुर्लभ लगे।
मुनि पुंगव सुधासागर महाराज व समाज का योगदान के कारण इन मंदिरों का जीर्णोद्धार देखते ही बनता था। हमने देखा मंदिर परिसरों की संख्या 40 से अधिक ही रही होगी। साथ ही माना यह जाता है कि प्राचीन दुर्लभ जिन प्रतिमाओ जितनी यहां है अन्यत्र कही नही है। जब हमने देखा अवलोकन किया 2 हज़ार से अधिक जिनप्रतिमाओ एक साथ विश्व मे कही नही है। ऐसी दुर्लभ प्रतिमाओ को देख भला किसका मन चकित नही होगा। माना यह जा रहा है, इस पावन भूमि पर अनगिनत जिनप्रतिमाओ के होने का अनुमान है। ऐसे पावन तीर्थ का वन्दना बार बार कर पुण्य लाभ लेना चाहिए।
मेरे साथी सभी सदस्यों के भाव

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इस तीर्थ वन्दना में रहे मेरे सभी साथी आनंद टोंग्या,पार्थ टोंग्या,रुचि टोंग्या, शैलेश पाटनी, जुली पाटनी, सुबोध पाटनी, सलोनी पाटनी, जम्बू कुमार, मधु जैन, सोना, सुहानी,भवी, पदमकुमार, सुलोचना प्रिया व मेरा मन वही रम जाने का हो रहा था। परंतु समय की अपनी मर्यादा और आगे की यात्रा हेतु हम सभी मध्यान में आगे की और बढ़ गए।
यही भावना भाता हु पुण्यात पुनः दर्शनम
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी

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