मोह से मूर्छित होने के कारण जीव पर वस्तु को भी अपनी मानता हैं। कनकन्दी गुरुदेव
भीलूड़ा
अपरिग्रहधारी आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि मूर्छा परिग्रह हैं। मोह से मूर्छित होने के कारण जीव पर वस्तु को भी अपनी मानता हैं। जीव एकपक्षीय प्रेम करता हैं। जीव मेरी दुकान, मेरी जमीन, मेरा सोना मानकर स्वयं जड़ वस्तु परिग्रह से मोहित होने के कारण, वह तुम्हारा नहीं होते हुए भी तुम इसे मेरा समझते हो। जड़ वस्तुएं तुम्हें प्रेम नहीं करती तुम ही इसे प्रेम करते हो। यह एक पक्षीय प्रेम हैं। मोह नहीं करना, आसक्ति नहीं करना, यह शरीर मेरा नहीं मानना अपरिग्रह हैं। मोह का अर्थ मिथ्या, अहंकार ममत्त्वपूर्ण परिणाम है। मोही आत्मा अनात्मा, हित अहित को नहीं जानता हैं। क्योंकि वह आत्मा से मूर्छित होता है। शरीर से, ब्रेन से मूर्छित होना अलग है। धर्म भी धन के परिग्रह से आच्छादित हैं। अहंकार, ममकार, राग, द्वेष, मोह रहेगा तब तक परिग्रह रहेगा। परिग्रह के लिए ही राजनीति, संविधान, शिक्षा, व्यापार ,फैक्ट्री आदि हैं। ममत्त्व परिणाम कम होते ही अनंत भव कट जाता है। मोह होने के कारण ही बाह्य अभ्यंतर परिग्रह को बढ़ाने, उपार्जन करने, रक्षण करने में लालसा होती हैं। पेड़, पशु, पक्षी, चीटी, कीट, पतंग, गर्भस्थ शिशु भी परिग्रह धारी हैं।
व्यापार बढ़ाने की अभिलाषा, मूर्छा हैं। अंतरंग भाव के कारण बाह्य परिग्रह से नरक निगोद मिलता हैं। ममत्त्व भाव ही परिग्रह है। आत्मा के कारण तीन लोक के अधिपति हो परंतु परिग्रह बढता है मूर्छा बढ़ती है मूर्छा बढ़ती है परिग्रह बढ़ता हैं, लोभ बढ़ता हैं। अंतरण परिग्रह वाले जीव के पास बाह्य परिग्रह नहीं भी हो तो भी परीग्रही हैं। आचार्य श्री के प्रिय शिष्य आचार्य विद्यानंद जी गुरुदेव ने कहा कि परिग्रह के संबंध हमारे आंतरिक भावों से हैं। परिग्रह का भाव आत्म परिणाम से अलग नहीं होता हैं। सिर्फ हमारे परिणाम ही हमें अपरिग्रही अथवा परिग्रह धारी बनाते हैं। परिग्रह को दुख का कारण, संसार का कारण होते हुए भी परिग्रह को लक्ष्मी कहते हैं। लक्ष्मी खड़ी है चंचल है नाशवान है यह आध्यात्मिक बोध देती है कि वह कभी भी चली जा सकती है।

गुरुदेव ने कहा अपरिग्रह को कहना, बोलना, लिखना, सरल है परंतु भावात्मक दृष्टि से उस पर आचरण करना बहुत कठिन है परिग्रह के प्रति आसक्ति कम होनी चाहिए जिससे राग, द्वेष, लड़ाई, झगड़े, कषाय अपने आप कम हो जाएंगे। एक तिनके के ऊपर लोभ करना भी कर्म बंध का कारण है परंतु मुकुट धारी भी इसे अपना नहीं मानकर अपरिग्रह थारी बन सकता है कर्म बंध का कारण नहीं होगा। एक व्यक्ति पंच इंद्रियों का सेवन करते हुए भी निर्मोही है वह कर्म बंध का कारण नहीं है। अपरिग्रह की गाथाएं श्लोक कंठस्थ याद करने पर भी भावात्मक ज्ञान नहीं होना मोक्ष के लिए कोई कार्यकारी नहीं है। इसलिए आचार्यों ने कहां है आम्नाय , मनन, बार बार पढ़ना, वाचना से पाचन श्रेष्ठ हैं। जटिल विषय पर अधिक ध्यान समय देना पड़ता है परिग्रह हमारे अंदर ही है उसने हमारी आत्मा को पकड़ लिया है परंतु हम इसे नहीं पकड़ पा रहे हैं।

ब्रह्मचारी सोहनलाल जैन तथा पुनर्वास कॉलोनी के सुमतिलाल जैन ने बताया कि आचार्य श्री के पास पढ़ने से पहले हम परिग्रह को पाप जानते ही नहीं थे।परिग्रह को पुण्य मानते थे। जिसके पास अधिक परिग्रह है उसको पुण्यशाली मानते थे। विजयलक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
