आचार्य श्री विद्यासाग़र महाराज कोई कहता तुमको दिगम्बर, कोई कहता पैगम्बर

काव्य रचना

आचार्य श्री विद्यासाग़र महाराज कोई कहता तुमको दिगम्बर, कोई कहता पैगम्बर

भू देखा,भूमंडल देखा

मेने नदी सरोवर देखा

पर्वत की चोटी पर जाकर, जाने कहां कहां नहीं देखा।

लेकिन जबसे देखा तुमको, तबसे मुझको लागा ऐसा

जेसे मेने चलते फिरते, वर्तमान महावीर को देखा

नहीं जानता कौन हो गुरुवर, और कहा से आए हो

मेरे जीवन की हर साँसों मे, गुरुवर तुम्ही समाए हो।

कोई तुमको कहे दिगंबर, कोई कहता पैगम्बर

कोई कुंदकुंद सा कहता, कोई कहता तीर्थंकर

सच मे गुरुवर आप हो अदभुत, जिनशासन उन्ननायक हो

जिनवाणी रसपान कराते, जिनवाणी के ज्ञायक हो

क्या उपमा दे दू तुमको, तुम तो सबसे ही न्यारे हो।

हे गुरुवर विद्यासागर हमको, प्राणों से भी प्यारे हो

समयसार सार तुम्ही हो, जिनशासन आधार तुम्ही हो

जिनशासन के सूरज चन्दा, वर्तमान भगवान तुम्ही हो

तुमसे ही तो हम है गुरुवर, जैसे जड़ से होता तरुवर

तुम बिन लगे जीवन अधूरा

तुम करते सपनो को पूरा

तीर्थंकर के दूत तुम्ही हो

जिनवाणी के पूत तुम्ही हो

मुक्तिवधु के कांत तुम्ही हो

भविष्य के अरिहंत तुम्ही हो

हमे झलकते गुरुवर ऐसे परम सिद्ध भगवंत तुम्ही हो

 

 

रचनाकार – कवि ह्रदय पण्डित विकर्ष “शास्त्री”

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