वसुधैव कुटुंब

काव्य रचना

हम छोटी छोटी बातों पर उलझ जातें है और कभी-कभी तो इसके कूट दुष्परिणाम भी आते है इसी को लक्ष्य कर देखिए आज की रचना हमारी कुछ इस तरह सादर—‘

वसुधैव कुटुंब

एक एक मिल दो बनते है
दो दो मिल फिर चार
चार मिले फिर एक यदि तो
पंच समाज श्रेष्ठ आधार

पंचों से मिल बने समाज
और *समाज* मिले बन देश
देश देश मिल विश्व बने
तब *वसुधैव कुटुंब* संदेश

जब धरती ही परिवार बनी
तब कौन है किसका दुश्मन
*विश्व शांति* की प्रवल भावना
जिससे खिलते जीवन सुमन

*ईर्ष्या द्वेष घृणा नफरत* से
निश्चित *अधम बने मानव*
अपना *स्वार्थ साधने* तत्पर
मानव बन जाता दानव

*पद लालच पथ भ्रष्ट* कराती
और संस्था ढह जाती है
जल अम्रत पर अति वारिष से
पकी फसल भी बह जाती है

*पदादिकारी तो चरण पादुका*
जो कांटो से रक्षा करती
ऐसे सेवाभावी बने यदि तो
दुनिया अभिनंदन करती

वैचारिक मतभेद सुनिश्चित
अतःआपस मे न उलझो
*प्रेम प्रीत वात्सल्य* भाव को
‘अनेकांत से सुलझो।

राजेन्द्र जैन अनेकांत
बालाघाट दि 11-6-2022

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