मनुष्य पर्याय जन्म-जन्म के पुण्य से प्राप्त होती है। निष्कंप सागर महाराज

धर्म

मनुष्य पर्याय जन्म-जन्म के पुण्य से प्राप्त होती है। निष्कंप सागर महाराज

देवरीकला

देवरीकला मे ञान विद्या शिक्षण शिविर का आयोजन हो रहा है इस बेला पूज्य मुनिश्री निष्कंप सागर महाराज ने  चारो गतियो के विषय मे प्रकाश डाला  उन्होने  कहा कि यदि चारों गतियों का आंकलन करे तो नरक गति, देव गति, त्रस गति सभी में जीवों की संख्या असंख्यात है। जबकि मात्र मनुष्य गति में ही जीवों की संख्या संख्यात है।

उन्होने मार्मिक उद्बोधन देते हुए कहा ये  मनुष्य पर्याय हमको  बड़े ही दुखों से प्राप्त हुई। भाव भीने उदगार मे मां के संदर्भ मे कहा माँ के गर्भ में 9 माह तक  उल्टा लटका  कष्टों को सहन किया। जिसके दुखों का वर्णन नहीं किया जा सकता । आगे सीख देते हुइ कहा जब मनुष्य गर्भ से बाहर आया तो उसने बचपन में धर्म नहीं किया, युवावस्था में पंच इन्द्रियों के भोगों को भोगता रहा और वृद्धावस्था में अर्ध मृतक के समान रहा। शरीर माँ  ने साथ नहीं दिया तो चाहते हुए भी धर्म की कोई क्रिया नहीं की और इस मनुष्य ने पर्याय को यूं ही गवां दिया। कर्म के विषय पर उल्लेख करते कहा कर्म के द्वारा हमको चार मौके दिए हमनें वह  यूं ही खो दिए।  मनुष्य पर्याय व भारत देश के विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कीये मनुष्य पर्याय  अनंत जन्म-जन्म के पुण्य से प्राप्त होती है। विशेष रूप से कहा  विचार करो अगर तुम्हारा जन्म भारत में नहीं कहीं और होता तो धर्म, संस्कार नहीं होते, गुरु नहीं होते, भगवान नहीं होते।

संकलित अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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