कल्पना छोडकर राह श्रम की चुनोती

काव्य रचना

कल्पना छोड़कर राह श्रम की चुनोती
तुमको मंजिल हकीकत की मिल जाएगी बाहें फैला के सागर सा विस्तार दो ,
एक दिन हर नदी आकर मिल जाएगी।

आज मिलके सभी प्रेम को जान ले,
जो युगों तक अबूझी पहेली रहा,
मीरा की साधना, राधा की कामना ,
द्रौपदी की जो निश्छल सहेली रहा,
शिव सी होगी अगर, अपनी आराधना फिर सती सी सती, हमको मिलजाएगी।

घर में आधार हो ,गर मोहब्बत का तो ,
दीमकें नफरतों की ना आ पाएंगी ,
सुखी डालों को सावन मिलेगा अगर ,
कोयलें फिर वहां गीत गा पाएंगी,
प्रीत के जल से जो सिंच ले हम सभी नागफनिया गुलाबों सी खिल जाएगी,

सिर्फ सांसे चले और हम ना चले,
फिर उसे जिंदगी कैसे कह पाओगे ,
हे खुदा और सजदा मगर मन नहीं,
फिर भला बंदगी कैसे कह पाओगे,
जो चमकना है टुकड़े बनो सूर्य के,
दीप से रोशनी कितनी मिल पाएगी।

नीतू बाफना राजसमंद
राजस्थान

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