लल्लनटॉप थे, लल्लनटॉप हैं और लल्लनटॉप बने रहने की चाहत है!
लेकिन यहाँ लल्लनटॉप होने का अर्थ दुनिया की निगाहों में बड़ा बन जाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के संसार को इतना निर्मल, इतना उज्ज्वल और इतना उन्नत बना लेना है कि आत्मा के अतिरिक्त किसी दूसरी उपलब्धि का आकर्षण ही शेष न रहे।
ललितपुर की धरती पर 15 मई 1983 को जन्मे बालक विवेक भैया जी के जीवन में सांसारिक शिक्षा की भी अपनी ऊँचाइयाँ थीं। एम.बी.ए. फाइनेंस और एम.ए. इकोनॉमिक्स जैसी योग्यताएँ अर्जित कीं, जीवन के व्यावहारिक संसार को समझा, यहाँ तक कि गुरुग्राम की एम.एन.सी. में बारह वर्षों तक अकाउंटेंट के रूप में कार्य किया। दुनिया की भाषा में कहें तो एक व्यवस्थित, सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन था। भविष्य की सुविधाएँ थीं, संभावनाएँ थीं और संसार की दृष्टि में सफलता के अनेक दरवाजे खुले थे।
लेकिन शायद उनके भीतर कोई दूसरा ही दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा कर रहा था। वह दरवाजा, जिसके पार पद नहीं, पवित्रता थी; वेतन नहीं, वैराग्य था; सुविधाएँ नहीं, संयम था और संसार को जीतने की महत्त्वाकांक्षा नहीं, स्वयं को जीतने की भावना थी।
फिर आया मई 2011 का वह पुण्य अवसर, जब आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी महाराज से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर जीवन की दिशा को एक नई आध्यात्मिक दृष्टि मिली। यह केवल एक व्रत नहीं था, बल्कि अपने भीतर के विवेक को जगाने, इच्छाओं को अनुशासित करने और आत्मकल्याण की राह पर आगे बढ़ने का संकल्प था।
और जब जीवन को दिशा देने वाला गुरु मिल जाए, तब रास्ते की कठिनाइयाँ भी साधना की सीढ़ियाँ बन सकती हैं।
08 जुलाई 2024 को निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज के संघ में प्रवेश ने इस यात्रा को नया आयाम दिया। गुरु का सान्निध्य मिला, गुरु के संस्कार मिले, गुरु की साधना को निकट से देखने और उनके बताए मार्ग पर स्वयं को ढालने का अवसर मिला। फिर 23 नवंबर 2025 को ऐलक दीक्षा के साथ जीवन ने एक और महत्त्वपूर्ण मोड़ लिया।
आज ऐलक श्री 105 सुनय सागर जी महाराज के रूप में उनकी यात्रा केवल वेश परिवर्तन की कहानी नहीं है; यह स्वयं को पुनः-पुनः गढ़ने की कहानी है। यह उस साधक की कहानी है जो अपनी पुरानी उपलब्धियों पर विश्राम नहीं करना चाहता, बल्कि प्रत्येक नए चरण पर अपने भीतर एक नई पात्रता विकसित करना चाहता है।
गुरु ने राह दिखाई है, अब उस राह पर बहुत दूर जाने की तमन्ना है।
ऐसी दूरियाँ नहीं, जिन्हें किलोमीटरों में नापा जा सके; ऐसी दूरियाँ, जिन्हें आत्मा की निर्मलता, कषायों की क्षीणता और मोह से मुक्ति की दिशा में बढ़ते कदमों से पहचाना जा सके। ऐसी मंजिल, जहाँ पहुँचकर लौटने का प्रश्न ही न रहे; जहाँ संसार के आकर्षण पीछे छूट जाएँ और आत्मकल्याण का लक्ष्य ही जीवन की एकमात्र सार्थकता बन जाए।
मगर इस राह पर चलने के लिए केवल भावना पर्याप्त नहीं होती। यहाँ प्रत्येक दिन स्वयं से संघर्ष करना पड़ता है, प्रत्येक क्षण अपने दोषों को पहचानना पड़ता है और प्रत्येक परिस्थिति में गुरु के संस्कारों को अपने आचरण में उतारना पड़ता है। दीक्षा मिल जाना एक महान सौभाग्य है, लेकिन उस दीक्षा की गरिमा को जीवन के प्रत्येक क्षण में जीना निरंतर साधना है।
और यही तो सबसे सुंदर बात है—वे स्वयं को पूर्ण घोषित करके नहीं चल रहे, बल्कि स्वयं को गढ़ते हुए चल रहे हैं। अपनी अपूर्णताओं को पहचानकर, अपने पुरुषार्थ को जगाकर और गुरु के बताए पथ पर अपने कदमों को दृढ़ बनाकर आगे बढ़ने की भावना ही साधना की असली पूँजी है।
जगत पूज्य गुरुश्रेष्ठ श्री सुधासागर जी महाराज के चरणों से मिली प्रेरणा को जीवन की दिशा बना लेना और उनके संस्कारों को अपने व्यक्तित्व में उतारने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना—यही शिष्यत्व की सुंदरता है।
मन में एक ही पवित्र आकांक्षा सजी है—गुरु ने जिस राह पर चलाया है, उस राह पर रुकना नहीं है; परिस्थितियों से घबराकर मुड़ना नहीं है; उपलब्धियों पर इतराकर ठहरना नहीं है। बस चलते रहना है, सीखते रहना है, स्वयं को तराशते रहना है और आत्मकल्याण की मंजिल की ओर बढ़ते रहना है।क्योंकि संसार में बहुत कुछ बन जाना आसान हो सकता है, लेकिन अपने भीतर के विकारों को जीतकर निर्मल बनना सबसे कठिन पुरुषार्थ है।
लल्लनटॉप थे, लल्लनटॉप हैं और लल्लनटॉप बने रहने की चाहत है—लेकिन अब दुनिया की वाहवाही के लिए नहीं, आत्मा की शुद्धि के लिए!गुरु का हाथ सिर पर हो, गुरु के संस्कार हृदय में हों और गुरु की दिखाई राह पर चलने का संकल्प जीवन में हो, तो फिर मंजिल की चिंता कैसी? साधक का काम है पुरुषार्थ करते रहना, अपने आपको बार-बार गढ़ते रहना और प्रत्येक दिन पहले से बेहतर साधक बनने का प्रयास करते रहना।इसी मंगल भावना के साथ ऐलक श्री 105 सुनय सागर जी महाराज की साधना, संयम और आत्मकल्याण की अभिलाषा की हृदय से अनुमोदना।
गुरु के चरणों से शुरू हुई यह यात्रा आत्मा के परम वैभव की दिशा में निरंतर अग्रसर हो—यही मंगलकामना, यही श्रद्धा और यही सच्ची अनुमोदना है। 🙏
#श्रीश ललितपुर
