बैलों को चमकाने से शुरू हुई परंपरा, अब युवाओं के बीच होता है अनोखा ‘पटाखा युद्ध’, एक-दूसरे पर बरसाते हैं आतिशबाजी!
नैनवां में दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की रात सजता है पटाखा युद्ध का अनूठा रोमांच, 1980-81 से चली आ रही परंपरा बनी शहर की पहचान**
**नैनवां। राजस्थान के नैनवां शहर में दीपावली का उत्सव एक अनूठी और रोमांचक परंपरा के साथ मनाया जाता है। कभी खेतों में हल चलाने वाले बैलों को पटाखों की आवाज से चमकाने के उद्देश्य से शुरू हुई यह परंपरा आज युवाओं के बीच ‘पटाखा युद्ध’ के रूप में मशहूर हो चुकी है। दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की रात होने वाला यह आयोजन नैनवां की विशिष्ट पहचान बन गया है। करीब 1980-81 से चली आ रही इस परंपरा को देखने के लिए हर साल लोगों में खासा उत्साह और उत्सुकता रहती है।




**शाम ढलते ही सज जाता है पटाखा युद्ध का मैदान**
शाम करीब 7 बजे से ही शहर की गलियों और बाजारों में युवाओं की टोलियां सक्रिय हो जाती हैं। झंडे की गली, मालदेव चौक, लोहड़ी और चौहटी सहित प्रमुख स्थानों पर युवा दो तरफ आमने-सामने मोर्चा संभाल लेते हैं। एक ओर सूतली बम और रॉकेट लेकर युवाओं की टोली तैयार रहती है तो दूसरी ओर से भी मुकाबले का जवाब देने के लिए युवा जुट जाते हैं।



इसके बाद शुरू होता है पटाखों की आवाज और आतिशबाजी का सिलसिला। दोनों ओर से एक-दूसरे पर पटाखे फेंके जाते हैं और देखते ही देखते पूरा इलाका धमाकों से गूंज उठता है। युवा थैलियों में भरकर पटाखे लेकर पहुंचते हैं और अपनी-अपनी टोली के साथ इस अनूठे आयोजन में शामिल होते हैं।
**बाजार से निकलकर गलियों तक पहुंची परंपरा**
शुरुआत में यह आयोजन मुख्य बाजार तक ही सीमित था, लेकिन समय के साथ इसका दायरा बढ़ता गया। अब शहर के प्रमुख चौराहों और गलियों तक पटाखा युद्ध का रोमांच देखने को मिलता है। हालांकि सुतली बम और रॉकेट के इस्तेमाल के दौरान कई बार युवा चोटिल भी हो जाते हैं। ऐसे में इस अनूठी परंपरा के उत्साह के बीच सुरक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। आयोजन के दौरान पुलिस जाब्ता तैनात रहता है।



**बैलों की दीपावली से कैसे शुरू हुआ पटाखा युद्ध?**
इतिहास के जानकार एवं सेवानिवृत्त व्याख्याता भवानीसिंह सोलंकी बताते हैं कि इस पटाखा युद्ध का कोई विशेष ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं है। पुराने समय में किसान दीपावली पर बैलों का पूजन करते थे और उन्हें मंदिर में धोक लगाने के लिए ले जाते थे। इस दौरान बैलों को चमकाने के लिए उनके पैरों के पास पटाखे फोड़े जाते थे।
धीरे-धीरे यह सिलसिला बदलता गया और लोगों ने एक-दूसरे पर पटाखे फेंकना शुरू कर दिया। देखते ही देखते बैलों की दीपावली की यह परंपरा पटाखा युद्ध में बदल गई। खेती में आधुनिक तकनीक आने के बाद बैलों की उपयोगिता कम होती गई और उनकी दीपावली मनाने का पुराना स्वरूप भी पीछे छूट गया, लेकिन पटाखा युद्ध की परंपरा आज भी जारी है।
इस तरह नैनवां की यह अनूठी परंपरा समय के साथ अपना स्वरूप बदलते हुए आज भी दीपावली के उत्सव में रोमांच और कौतूहल का विशेष आकर्षण बनी हुई है।
**संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी**
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