सल्लेखना आत्महत्या नहीं, आत्मकल्याण की उत्कृष्ट साधना है : मुनि श्री योगसागर जी महाराज

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सल्लेखना आत्महत्या नहीं, आत्मकल्याण की उत्कृष्ट साधना है : मुनि श्री योगसागर जी महाराज

रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक 126 एवं 127 पर प्रवचन; कषायों को क्षीण कर समताभाव पुष्ट करने की दी प्रेरणा

कोटा, 4 नवंबर 2026, बुधवार।

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 126 एवं 127 पर प्रवचन देते हुए सल्लेखना की आध्यात्मिक महत्ता समझाई।

 

 

सल्लेखना का उद्देश्य कषायों को क्षीण करना

मुनि श्री ने कहा कि समाधिमरण आत्महत्या नहीं है, बल्कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर राग-द्वेष, मोह-ममता और सांसारिक इच्छाओं को धीरे-धीरे कम करते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की साधना है। इसमें आहार की मात्रा और रसों का क्रमशः परिमाण कम करने की धार्मिक प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है। साथ ही मन, वचन और काय पर संयम रखते हुए आत्मबल, इच्छाशक्ति और उत्साह को दृढ़ बनाया जाता है।

उन्होंने बताया कि सल्लेखना का उद्देश्य केवल शरीर को कृश करना नहीं, बल्कि कषायों को क्षीण करना और समताभाव को पुष्ट करना है। समाधिमरण के समय सम्यग्दर्शन, श्रद्धा और आत्मस्वभाव में रुचि बनी रहनी चाहिए। राग-द्वेष तथा आकुलता का त्याग कर परिणामों को निर्मल एवं शांत बनाना ही इस साधना का प्रमुख भाव है।

श्रुत अमृत का पान मन को बनाता है निर्मल

मुनि श्री ने श्रुत अमृत का पान करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि सुखदायी एवं दुःखों को दूर करने वाली जिनवाणी और शास्त्रों का स्वयं श्रवण करें तथा दूसरों को भी सुनाएं। इससे चित्त प्रसन्न, निर्मल और धर्ममय बनता है। जीवन में वैराग्य बढ़ाते हुए सांसारिक सुखों की आसक्ति छोड़ने तथा मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास जागृत करने पर भी उन्होंने विशेष जोर दिया।

इंद्रिय संयम आत्मविजय का मार्ग

इंद्रिय संयम को आत्मकल्याण के लिए आवश्यक बताते हुए उन्होंने समझाया कि मनुष्य को अपनी इच्छाओं और इंद्रियों के अधीन न रहकर उन्हें विवेक एवं आत्मसंयम के अनुसार संचालित करना चाहिए। यही आत्मविजय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

श्लोक 127 में आहार त्याग की क्रमिक प्रक्रिया का वर्णन

श्लोक क्रमांक 127 के संदर्भ में मुनि श्री ने सल्लेखना में आहार त्याग की क्रमिक धार्मिक प्रक्रिया का वर्णन किया। इसमें अन्न, दूध एवं छाछ आदि के त्याग का क्रम तथा अंत में कांजी और उष्ण जल जैसे सीमित आहार का उल्लेख किया गया है। यह वर्णन सल्लेखना की पारंपरिक धार्मिक प्रक्रिया के संदर्भ में किया गया।

मुनि श्री के प्रवचनों का मूल संदेश यही रहा कि जीवन की सार्थकता केवल भौतिक सुखों के संग्रह में नहीं, बल्कि आत्मा को कषायों से मुक्त करने, इच्छाओं को सीमित करने और समता एवं संयम के भाव विकसित करने में है। सल्लेखना का आध्यात्मिक लक्ष्य आत्मशुद्धि, वैराग्य और समभाव की साधना है।

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ ________ परिवार ने प्राप्त किया। कलश स्थापना के पुण्यार्जक परिवार का विवरण प्राप्त होना शेष है।

श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन देवकरण, श्रीमती सुलोचना सुनील रोंपा वाले (हनुमान नगर) तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक राजकुमार ठोरा परिवार ने प्राप्त किया।

भक्तामर विधान में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।

श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ उपवास प्राप्त हुआ। वहीं मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य चन्द्र प्रकाश जी हर्षा जी कोटिया

परिवार को प्राप्त हुआ।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए तथा जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

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🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश

आत्मकल्याण का मार्ग बाहरी संग्रह से नहीं, बल्कि भीतर के राग-द्वेष और कषायों को कम करने से प्रशस्त होता है।

आज के प्रवचन का सार

सल्लेखना का आध्यात्मिक भाव समता, वैराग्य, आत्मसंयम और कषायों की निर्जरा है। जिनवाणी का श्रवण तथा इंद्रिय संयम आत्मशुद्धि के महत्वपूर्ण साधन हैं।

स्वास्थ्य संदेश

शरीर की देखभाल और स्वास्थ्य के प्रति सजगता आवश्यक है। किसी भी प्रकार का आहार परिवर्तन या उपवास स्वास्थ्य की स्थिति और योग्य मार्गदर्शन को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।

धर्मसाधना का संदेश

इच्छाओं पर संयम, मन-वचन-काय की शुद्धि, जिनवाणी का श्रवण और प्रत्येक परिस्थिति में समभाव बनाए रखना ही आत्मकल्याण की दिशा में सार्थक साधना है।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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