*दुर्लभ मनुष्य पर्याय पाकर सिद्धत्व की यात्रा की ओर बढ़ें, पुण्य से मिले पद का दुरुपयोग न करें : निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी*
कुण्डलपुर(म.प्र.)।
निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि हम सभी को प्राप्त यह मनुष्य जीवन अनेक भवों के पुण्य पुरुषार्थ का परिणाम है। मनुष्य पर्याय का महत्व इसलिए है कि इसी के माध्यम से जीव सिद्धत्व अर्थात मोक्ष की यात्रा पूरी कर सकता है। चारों गतियों में देव, नरक और तिर्यंच गति से सीधे मुक्ति संभव नहीं है। मोक्ष की यात्रा का सीधा मार्ग मनुष्य गति से ही प्रशस्त होता है। मनुष्य पर्याय में भी कर्मभूमि का मनुष्य, पुरुष पर्याय प्राप्त कर रत्नत्रय की भावना से दिगंबरत्व धारण करके आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसलिए मनुष्य पर्याय को अत्यंत दुर्लभ बताया गया है।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक जीव की यात्रा निगोद से प्रारंभ होकर विभिन्न पर्यायों से गुजरती हुई आगे बढ़ती है। हमारी, तीर्थंकर भगवंतों की और आज तक सिद्ध परमेष्ठी बने सभी महापुरुषों की यात्रा भी इसी क्रम से जुड़ी हुई है। हालांकि ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं है कि प्रत्येक जीव को सभी पर्यायों से गुजरना ही पड़े। सिद्धांत ग्रंथों में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जिनमें जीव निगोद से निकलकर बीच की किसी पर्याय को प्राप्त करते हुए मनुष्य बना और मुनि दीक्षा लेकर मोक्ष को प्राप्त हो गया। परिणामों की विचित्रता ऐसी है कि जीव के भाव कब और कैसे बदल जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता। मुनि श्री ने कहा कि यदि आपने मनुष्य पर्याय के साथ आर्यखंड में जन्म लिया, जैन कुल प्राप्त किया और जिनधर्म के प्रति श्रद्धा जागृत हुई है तो समझना चाहिए कि पूर्व भवों में बहुत अच्छा पुण्य संचित किया है। लेकिन अब प्रश्न यह है कि इस दुर्लभ अवसर का आगे क्या उपयोग करना है? पिछली यात्रा की कहानी तो बन चुकी है, अब भविष्य की कहानी बनाना हमारे हाथ में है। मनुष्य जीवन केवल बीच का पड़ाव है, मंजिल नहीं। इस अवस्था को प्राप्त करने के बाद यदि आत्मकल्याण की दिशा में आगे नहीं बढ़े तो संभव है कि जीव फिर पीछे लौट जाए। जैसे कोई गाड़ी आगे बढ़ते-बढ़ते रुक जाए तो वह वापस भी लौट सकती है, उसी प्रकार मनुष्य पर्याय पाकर भी यदि परिणामों को नहीं संभाला तो जीव फिर संसार में भटक सकता है। इस बात को समझाने के लिए मुनि श्री ने संस्कृत नीति साहित्य की पुनर्मूषको भव की प्रेरक कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि एक साधु की कुटिया में कहीं से एक चूहा आ गया। साधु के यहां भोजन सामग्री मिलती थी, इसलिए वह वहीं रहने लगा। साधु को भी उसके रहने से कोई परेशानी नहीं थी। एक दिन चूहे पर बिल्ली ने हमला कर दिया। भयभीत चूहे को देखकर साधु ने अपनी शक्ति से उसे बिल्ली बना दिया। कुछ समय बाद कुत्ते ने बिल्ली पर हमला किया तो साधु ने उसे कुत्ता बना दिया। फिर शेर से डरने पर उसे शेर बना दिया। इस प्रकार चूहा क्रमशः बिल्ली, कुत्ता और शेर बनता चला गया। लेकिन शेर बनने के बाद उसके भीतर अहंकार और दंभ आ गया। अब वह साधु का ही अनिष्ट करने की सोचने लगा, जिसने उसे इतना शक्तिशाली बनाया था। साधु उसकी नीयत समझ गए। जैसे ही शेर ने साधु पर हमला करने का प्रयास किया, साधु ने कहा- पुनर्मूषको भव अर्थात फिर से चूहा बन जा। देखते ही देखते वह शेर पुनः चूहा बन गया। मुनि श्री ने इस कथा के माध्यम से समझाया कि पुण्य के प्रभाव से यदि जीवन में कोई ऊंचा पद, प्रतिष्ठा, शक्ति या विशेष उपलब्धि प्राप्त हो जाए तो अपनी बुद्धि और परिणामों को संभालकर रखना चाहिए। जिस निमित्त से हमें उन्नति मिली है, उसी के प्रति अहंकार और दुरुपयोग का भाव नहीं आना चाहिए। पद और सामर्थ्य का उपयोग विनम्रता, परोपकार और आत्मकल्याण के लिए होना चाहिए। अन्यथा अहंकार के कारण व्यक्ति अपनी प्राप्त उपलब्धियों को भी खो बैठता है और जिस ऊंचाई तक पहुंचा था, वहीं से वापस नीचे आ जाता है। इसलिए दुर्लभ मनुष्य पर्याय को पाकर केवल संसार में ऊंचा उठने का प्रयास न करें, बल्कि अपने परिणामों को निर्मल बनाकर सिद्धत्व की दिशा में आगे बढ़ें।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
