*प्रकृति के फेफड़ों पर प्रहार कर अपने जीवन की साँसें कैसे सुरक्षित रखेगा इंसान?– आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज*
नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर।
आज इंसान प्रदूषित शहरों को छोड़कर गाँवों की तलाश कर रहा है। हाथों में कुल्हाड़ी लेकर छाँव ढूँढ़ने निकल पड़ा है। कितना विचित्र विरोधाभास है कि एक ओर इंसान शहरों की भागदौड़ और प्रदूषण से परेशान होकर गाँवों की ओर भाग रहा है, तो दूसरी ओर कुछ लोग गाँवों को भी शहरों में तब्दील करने पर तुले हैं। इंसान को यह समझना होगा कि पेड़-पौधे और वन इस धरती के फेफड़े हैं। यदि ये ही नहीं रहेंगे, तो इंसान के अपने फेफड़े भी स्वस्थ कैसे रह पाएँगे?
अपनी सुख-सुविधाओं और भोग-विलास की चाह में इंसान प्रकृति का कितना दोहन कर सकता है, यह आज साफ दिखाई दे रहा है। जिस प्रकृति की गोद में जीवन सुरक्षित है, उसी प्रकृति को इंसान अपने स्वार्थ के लिए नुकसान पहुँचा रहा है। विकास की अंधी दौड़ में हम यह भूलते जा रहे हैं कि प्रकृति का संरक्षण ही वास्तव में जीवन का संरक्षण है।



वहीं जीवन के बदलते मूल्यों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आज इंसान बेपरवाह होकर सागर में चला जा रहा है। दुआ से ज्यादा दवा पर निर्भर होता जा रहा है। दुआ देने वाला कोई रहा नहीं, क्योंकि किसी का भला करना आज इंसान को आता ही नहीं। आज स्थिति यह है कि न कोई माँगने वाला आता है और यदि कोई आ भी जाए, तो उसे देने वाला कोई नहीं मिलता।



अंततः इंसान को यह समझना होगा कि जीवन केवल सुख-सुविधाएँ जुटाने का नाम नहीं है, बल्कि प्रकृति की रक्षा करने, दूसरों के प्रति संवेदनशील रहने और मानवता को जीवित रखने का भी नाम है। यदि आज हमने पेड़-पौधों, वनों और मानवीय मूल्यों की रक्षा नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा।
माही जैन धीरावत पीपलखूंट प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
