जीवन में मर्यादा और संयम जरूरी, लेकिन नियमों में उलझना नहीं, सहजता-शांति विकसित करना ही असली साध्य : राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज*

धर्म

*जीवन में मर्यादा और संयम जरूरी, लेकिन नियमों में उलझना नहीं, सहजता-शांति विकसित करना ही असली साध्य : राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज*

 

मधुबन।

जीवन को सार्थक और संस्कारित बनाने के लिए धर्म, मर्यादा, संयम और सदाचार का पालन आवश्यक है, लेकिन इनका उद्देश्य केवल नियमों के बंधन में रहना नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर सहजता, सरलता, शांति और सद्भावना का विकास करना है। आधुनिकता के नाम पर बढ़ते सामाजिक भटकाव, युवाओं के जीवन में मर्यादाओं के हनन, अभिभावकों की जिम्मेदारी और नियम-संयम के वास्तविक उद्देश्य पर राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने शंका समाधान के दौरान युवाओं को महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि *जीवन में बदलाव स्वीकार्य है, लेकिन ऐसा भटकाव नहीं,* जो व्यक्ति को अपने संस्कारों और नैतिक मूल्यों से दूर कर दे। गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि युवाओं में विवाह पूर्व शील और मर्यादा के पालन से जुड़े प्रश्न पर मुनि श्री ने कहा कि वर्तमान समय में मर्यादाओं का जितना हनन हो रहा है, वैसा पहले देखने को नहीं मिलता था। लोगों की सोच तेजी से बदल रही है, सुविधाएं सहजता से उपलब्ध हैं और विवाह की उम्र भी बढ़ती जा रही है। सहशिक्षा के कारण युवावस्था से ही लड़के-लड़कियां साथ पढ़ते और आगे बढ़ते हैं। विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है, लेकिन जब निकटता मर्यादाओं से परे चली जाती है और मीडिया तथा सामाजिक वातावरण भी ऐसे व्यवहार को बढ़ावा देने लगते हैं, तो युवाओं के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी होती हैं। महाराज श्री ने कहा कि ऐसे वातावरण में युवाओं को मर्यादित जीवन जीने के लिए विशेष मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इसका प्रभावी उपाय है कि बच्चों को दसवीं कक्षा में प्रवेश करते ही गुरुओं के संपर्क में लाया जाए और उन्हें जीवन की मर्यादाओं का बोध कराया जाए। वे बच्चों को सात नियमों के माध्यम से जीवन की लक्ष्मण रेखा समझाते हैं और अनुभव करते हैं कि इन नियमों से उन्हें सही दिशा मिलती है। अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों को केवल पढ़ाई, करियर और भौतिक उपलब्धियों के लिए तैयार न करें, बल्कि उन्हें यह भी सिखाएं कि जीवन में कहां रुकना है, मौज-मस्ती को कितना स्थान देना है और अपने लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है। सुख अल्पकालिक होता है, जबकि हित का संबंध भव-भवांतरों से जुड़ा है। इसलिए क्षणिक सुख के बजाय दीर्घकालिक हित को महत्व देना चाहिए। वर्तमान सामाजिक स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए मुनि श्री ने एक अभिभावक का प्रसंग सुनाया, जिन्होंने बेटे के विवाह के लिए योग्य जीवनसाथी तलाशने में आ रही कठिनाइयों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, कई विवाह प्रस्तावों में मद्यपान जैसी आदतें सामने आ रही हैं। महाराज श्री ने कहा कि आधुनिकता के नाम पर बदलाव स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन भटकाव स्वीकार नहीं होना चाहिए। समाज को युवाओं के सामने सही आदर्श रखने होंगे और उन्हें समझाना होगा कि मर्यादा उनके जीवन, संबंधों और भविष्य के लिए क्यों आवश्यक है। उन्होंने विवाह की बढ़ती उम्र पर भी चिंता जताते हुए कहा कि विवाह 22-23 वर्ष की उम्र तक हो जाना चाहिए। आज स्थिति यह बन रही है कि विवाह देर से होता है, जबकि उससे पहले ही युवा ऐसी गतिविधियों में पड़ जाते हैं, जो उनके संस्कारों और जीवन-मूल्यों के अनुकूल नहीं हैं। महाराज श्री ने कहा कि बच्चों को दोष देने से समस्या का समाधान नहीं होगा, क्योंकि उनके व्यवहार पर वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ता है। वे गुरुओं के सामने अपने जीवन की बातें ईमानदारी से बताते हैं, जिससे वर्तमान समय की वास्तविक स्थिति सामने आती है।

 

 

 

ऐसे में माता-पिता को संतान की परवरिश जागरूकता और संवेदनशीलता के साथ करनी चाहिए। धर्म को बच्चों पर थोपने के बजाय उनके हृदय में धर्म के प्रति श्रद्धा जगानी चाहिए। उनके भीतर पापभीरुता, संयम और सदाचार का भाव विकसित करना चाहिए, ताकि वे स्वयं सही और गलत का विवेक कर सकें। नियमों के वास्तविक उद्देश्य को समझाते हुए मुनि श्री ने खेल का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक खेल के कुछ नियम होते हैं। नियम हटा दिए जाएं तो खेल का आनंद नहीं रह जाता, लेकिन कोई व्यक्ति नियमों को ही पकड़कर बैठ जाए और खेल खेले ही नहीं, तो उसे समझदार नहीं कहा जा सकता। नियम खेल को आनंददायक बनाने का माध्यम हैं, स्वयं खेल नहीं। इसी प्रकार जीवन में नियम आवश्यक हैं, लेकिन जीवन का आनंद केवल नियमों में उलझे रहने में नहीं है। व्रत, नियम और संयम साधन हैं, साध्य नहीं। उनका उद्देश्य जीवन को अनुशासित करके व्यक्ति के भीतर सहजता, सरलता, शांति और सद्भावना विकसित करना है।

मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि नियमों का पालन तभी सार्थक है, जब उससे व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आए और व्यक्ति दूसरों के प्रति अधिक संवेदनशील तथा सद्भावपूर्ण बने। यदि नियमों के पालन के बावजूद जीवन में सहजता और शांति नहीं आती, तो उनके वास्तविक उद्देश्य को समझने की जरूरत है। जीवन का असली आनंद अंतरंग में सद्गुणों के जागरण में है। जब व्रत और संयम के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को सरल, शांत और संस्कारित बनाता है, तभी उसका जीवन धन्य होता है। इसलिए युवाओं को मर्यादाओं के प्रति जागरूक करना और नियमों को जीवन-विकास का माध्यम बनाना आज परिवार, समाज और धर्मगुरुओं की साझा जिम्मेदारी है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

 

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