जीवन में बड़ा बनना है या किसी बड़े उद्देश्य से जुड़ना है? — अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

धर्म

जीवन में बड़ा बनना है या किसी बड़े उद्देश्य से जुड़ना है? — अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

“कुर्सी बड़ी होने से आदमी बड़ा नहीं होता, कद बड़ा होना अलग बात है और दिल बड़ा होना अलग।”

व्यक्तिगत सफलता से आगे बढ़कर समाजहित और लोककल्याण के लिए जीने का दिया संदेश

पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ/

जीवन में बड़ा बनने की चाह रखना स्वाभाविक है, लेकिन वास्तविक महानता ऊंचे पद, धन-दौलत और प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि उस उद्देश्य में छिपी है, जिसके लिए मनुष्य अपना जीवन समर्पित करता है। जब व्यक्ति स्वयं की उन्नति से आगे बढ़कर समाजहित, मानवता और लोककल्याण के लिए कार्य करने लगता है, तभी उसके जीवन की सार्थकता सिद्ध होती है। यह प्रेरणादायी संदेश व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने पुष्पगिरी तीर्थ पर उपस्थित गुरु भक्तों को अपनी ओजस्वी वाणी में दिया।

 

 

पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग हेतु पुष्पगिरी तीर्थ पर विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी श्रृंखला में आचार्यश्री ने जीवन के वास्तविक उद्देश्य, महानता के अर्थ और समाज के प्रति मनुष्य के दायित्वों पर प्रकाश डालते हुए गुरु भक्तों को आत्मचिंतन की प्रेरणा दी।

 

रावण के पास सोने की लंका थी, लेकिन महान राम कहलाए

आचार्यश्री ने जीवन में बड़ा बनने की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि क्या ऊंचा पद, अपार धन और प्रतिष्ठा ही महानता के प्रमाण हैं? केवल बड़ी कुर्सी पर बैठने से कोई बड़ा नहीं बन जाता। वास्तविक बड़प्पन व्यक्ति के विचारों, उसके हृदय की विशालता और दूसरों के प्रति उसके व्यवहार में दिखाई देता है।

 

उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि रावण के पास सोने की लंका थी, अपार वैभव था, लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम महान कहलाए। इससे यह सीख मिलती है कि बाहरी संपन्नता से अधिक महत्त्व जीवन के आदर्शों और उद्देश्य का है। व्यक्ति की पहचान इस बात से नहीं होनी चाहिए कि उसके पास कितना धन है, बल्कि इससे होनी चाहिए कि उसके जीवन से कितने लोगों को प्रेरणा, सहायता और संबल मिलता है।

 

सफलता पूछती है—मुझे क्या मिला, उद्देश्य पूछता है—मेरे होने से किसे क्या मिला?

आचार्यश्री ने व्यक्तिगत सफलता और जीवन के बड़े उद्देश्य के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि स्वयं का पेट भरना सफलता है, लेकिन चार लोगों का पेट भरने की भावना रखना एक बड़े उद्देश्य की ओर कदम है।

व्यक्तिगत सफलता का केंद्र अक्सर स्वयं का विकास होता है, जबकि उद्देश्यपूर्ण जीवन में दूसरों की खुशियां, समाज की आवश्यकताएं और मानवता का कल्याण भी शामिल होता है। सफलता पूछती है—‘मुझे क्या मिला?’ जबकि जीवन का उद्देश्य पूछता है—‘मेरे होने से किसे क्या मिला?’

उन्होंने प्रेरित किया कि मनुष्य को केवल अपने लिए उपलब्धियां हासिल करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसकी सफलता का वास्तविक मूल्य तब बढ़ता है, जब उसका ज्ञान, अनुभव, सामर्थ्य और संसाधन दूसरों के काम आते हैं।

लक्ष्य बड़ा हो तो पहाड़ भी रास्ता नहीं रोक सकते

जीवन में लक्ष्य और संकल्प की शक्ति को समझाते हुए आचार्यश्री ने नदी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जब तक नदी के सामने कोई लक्ष्य नहीं होता, वह गड्ढे में जमा रह सकती है। लेकिन जब उसका लक्ष्य समुद्र से मिलने का बन जाता है, तो वह रास्ते में आने वाली बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ती जाती है।

इसी प्रकार जब मनुष्य अपने जीवन को किसी बड़े उद्देश्य से जोड़ लेता है, तो उसकी सोच, निर्णय और कर्मों में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है। छोटे-छोटे स्वार्थ पीछे छूटने लगते हैं और समाज के लिए कुछ सार्थक करने की भावना प्रबल होती है। बड़ा उद्देश्य व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की शक्ति देता है।

ज्ञान तिजोरी में रखने के लिए नहीं, बांटने के लिए है

आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को अपनी प्रतिभा, ज्ञान और सामर्थ्य का उपयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के उत्थान के लिए भी करना चाहिए। ज्ञान का वास्तविक महत्त्व तभी है, जब उससे दूसरों के जीवन में प्रकाश आए। किसी जरूरतमंद की सहायता करना, बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना, बीमारों की सेवा करना और जीवों के प्रति करुणा रखना भी लोककल्याण की भावना के महत्त्वपूर्ण रूप हैं।

उन्होंने पुष्पगिरी तीर्थ पर संचालित एवं विकसित की जा रही जनकल्याणकारी गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि स्कूल, अस्पताल और गौशाला जैसे सेवा कार्य किसी एक व्यक्ति के बड़ा बनने की कहानी नहीं हैं, बल्कि एक बड़े उद्देश्य से जुड़कर सामूहिक रूप से समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा हैं।

महानता पद से नहीं, परोपकार से मिलती है

आचार्यश्री के संदेश का सार यही है कि जीवन को केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की दौड़ न बनाया जाए। धन कमाना, प्रतिष्ठा प्राप्त करना और सफलता हासिल करना गलत नहीं है, लेकिन इन उपलब्धियों का उपयोग समाज के हित में करना ही जीवन को अधिक सार्थक बनाता है।

मनुष्य की महानता इस बात में नहीं कि कितने लोग उसके सामने खड़े होते हैं, बल्कि इस बात में है कि कितने लोगों के जीवन में वह सहारा बनकर खड़ा होता है। यदि हमारी सफलता से किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान आती है, किसी बच्चे को शिक्षा मिलती है, किसी पीड़ित को राहत मिलती है और किसी जीव को संरक्षण मिलता है, तो हमारा जीवन एक बड़े उद्देश्य से जुड़ने लगता है।

संदेश स्पष्ट है—जीवन में केवल बड़ा बनने का सपना मत देखिए, किसी बड़े उद्देश्य से जुड़ने का संकल्प भी लीजिए। क्योंकि पद और प्रतिष्ठा समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन समाजहित में किए गए सेवा कार्य लोगों के हृदय में लंबे समय तक जीवित रहते हैं।

प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी  9929747312

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