प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का 103 वा आचार्य पदारोहण दिवस भक्ति उत्साह पूर्वक आचार्य  श्री वर्धमान सागर संघ सानिध्य में आचार्य शांति सागर विधान की पूजन कर मनाया गया

धर्म

प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का 103 वा आचार्य पदारोहण दिवस भक्ति उत्साह पूर्वक आचार्य  श्री वर्धमान सागर संघ सानिध्य में आचार्य शांति सागर विधान की पूजन कर मनाया गया

सीकर

प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का 103 वा आचार्य पदारोहण दिवस भक्ति उत्साह पूर्वक आचार्य संघ सानिध्य में आचार्य शांति सागर विधान की पूजन कर मनाया गया आपकी हर शुभ अशुभ क्रिया से पुण्य पाप का बंध होता हैं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश 77 वर्षीय आचार्य श्री वर्धमान सागर जी दंग की नसिया सीकर में 41 साधु सहित विराजित है ।प्रतिदिन आचार्य संघ सानिध्य में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान हो रहे हैं।

 

 

आशीष जयपुरिया महेश काला ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की प्रेरणा से प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का 103 वा आचार्य पद प्रतिष्ठापना महोत्सव उनकी पूजन भक्ति कर आचार्य संघ सानिध्य में मनाया गया। आज आचार्य श्री शांति सागर विधान की संपूर्ण सामग्री अष्ट द्रव्य, अक्षत, विभिन्न नैवेद्य, अनेको पुष्पों, फल सूखे मेवे , श्रीफल आदि से पुण्यार्जक इंदौर के मास्टर स्पर्श,प्रहस्त,श्रीमती पूर्वा, समर कंठाली श्रीमती अंकुरि, लविश पंचोलिया, श्रीमती ज्योतिबाला, पवन जैन ,वीरेंद्र भैय्या,दीदी एवं स्थानीय समाज ने नृत्य पूर्वक द्रव्य विधान पर अर्पित किये। विधान का मंत्रोच्चार आचार्य श्री, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवं आर्यिका श्री महायश मति ने किया ,

 

 

आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व आर्यिका श्री महायश् मति माताजी ने बताया कि सन 1872 में भोज के पास येलगुल में जन्मे श्री सात गोंडा ने सन 1915 में क्षुल्लक दीक्षा और सन 1920 में मुनि दीक्षा श्री देवेंद्र कीर्ति जी से ली तथा सन 1924 में मुनि श्री शांति सागर जी को प्रथम आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया उसे दिन उन्होंने चार दीक्षाएं दी जिसमें प्रथम पट्टाचार्य श्री वीर सागर जी महाराज का भी आज 103 वा मुनि दीक्षा दिवस है।मुनि श्री हितेन्द्र सागर जी ने बताया कि आचार्य श्री शांति सागर जी ने जो जैन मंदिर,जिनवाणी, संस्कृति का संरक्षण कराकर,,सामाजिक बाल विवाह जैसे कुरीतियों को दूर कराया जैन समाज इनका ऋण चुका नहीं सकती हैं इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने उपदेश में बताया कि पंच परमेष्ठी महामंत्र में अरिहंत और सिद्ध के बाद आचार्य परमेष्ठी मध्य में आते हैं आचार्य के बाद उपाध्याय और साधु परमेष्ठी आते हैं अरिहंत और सिद्ध का ज्ञान आचार्य कराते हैं बिना संयम धारण कर साधु साधना के बगैर अरिहंत सिद्ध नहीं बनते हैं डॉ राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि आज का दिवस न केवल साधु समुदाय के लिए बल्कि श्रावकों सहित भारतवर्ष के लिए गौरव का दिवस है क्योंकि श्रमण परंपरा में प्रथम प्रथमाचार्य होने का गौरव श्री शांति सागर जी को प्राप्त हुआ है। आचार्य शांति सागर जी महाराज सभी को समयसार के पूर्व महाबंध का स्वाध्याय करने की प्रेरणा देते हैं क्योंकि आपकी हर क्रिया से शुभ अशुभ कर्म का बंध होता है। शास्त्र भगवान की देशना है, आचार्य,साधु परमेष्ठी,गुरुओं के उपदेश को ग्रहण करना चाहिए पुण्य का अर्जन व्रत नियम से होता है व्रत का निर्दोष पालन करना चाहिए। आचार्य श्री शांति सागर जी ने मंदिरों की रक्षा के लिए 1105 दिनों के बाद अन्न आहार लिया उन्होंने ताम्र पत्रों पर जिनवाणी अंकित करवाई अपने जीवन को चारित्र की प्रयोगशाला बनाकर चारित्र के सभी 6 खंडो विजय प्राप्त कर सच्चे चारित्र चक्रवर्ती बने। विधान सामग्री के पुण्यार्जक श्रीमती पूर्वा समर स्पर्श प्रहस्त अंकुरि लविश, पवन वीरेंद्र आदि ने आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की।

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