जहाँ आत्म परिणाम का हिंसन होता है वहाँ हिंसा है आचार्य कनकन्दी
गलियाकोट
अध्यात्मा योगी वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि जहां आत्मपरिणाम का हिंसन होता है। वह हिंसा हैं। आत्म परिणाम कलुषित हो, दूषित हो वहां हिंसा है।

आत्मधर्म, रत्नत्रय धर्म में किसी भी प्रकार की मलिनता लाना हिंसा है। अस्त्र शस्त्र नहीं होने पर भी स्वयं को घायल करते हैं, जेल में कषायो से युक्त हिंसा हैं। भावों में क्रोध मान माया लोभ है वह मुख्य हिंसा हैं। इन भावों से सहित स्वयं को मारना भी, कष्ट देना आदि भी भाव हिंसा है। इन भावों से सहित अन्य जीवो को मारना द्रव्य हिंसा हैं।

जीवन भर एक भी मछली नहीं पकड़ पाए तो भी उद्देश्य पकड़ने का होने के कारण हिंसा हैं।
उन्होनें कहा कोरोना वायरस भी हिंसक है। क्योंकि उसमें क्रोध मान माया लोभ होने से महा पापी हैं। लकवा ग्रस्त जीव कोई कार्य नहीं कर पाने पर भी भावों से अधिक पापी है। आचार्य श्री कहते हैं तुम भावों के द्वारा स्वयं की हत्या स्वयं करते हो । धर्म करते हुए, व्यापार करते हुए, गृह कार्य करते हुए परिणाम शुभ रखने चाहिए । जैन आगम जिनवाणी का संक्षेप सार यह है कि मनसे भाव श्रेष्ठ हैं । मन संज्ञी पंच इंद्रियों में ही होता है ।परंतु भाव एक इंद्रियों से लेकर सभी जीवो में होते हैं । राग द्वेष से सहित भाव जहां है, वहां हिंसा अवश्य होती है । राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, संकल्प, विकल्प, प्रमाद सब हिंसा है। शुद्ध आत्मा ही समयसार है। संकीर्ण रूढ़िवादी धर्म, आत्म कल्याण के लिए कार्यकारी नहीं है।
उन्होंने राजा श्रेणिक का उदाहरण दिया कहा राजा श्रेणिक में आत्मशक्ति कम, तथा कर्म शक्ति अधिक होने से आत्महत्या करके मरता है। क्योंकि मुनिराज के गले में मरा हुआ सांप डालकर कलुषित भाव से घोर घाती कर्म बांधा था । धर्म को नहीं जानने वाले धर्म को खट्टा बना देते हैं। केवल क्रिया कांड से धर्म नहीं होता । किसान खेत में काम करते हुए अनेक जीवो की हिंसा करते हुए भी अहिंसक है। स्थूल रूप से पाप नहीं करने वाले भावों से अधिक पापी भी हो सकते हैं। जब गुरु शिष्य को आत्मधर्म सिखाने के लिए डांटते हैं तो तीव्र ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है। घर गृहस्थी का परिवार मोह का परिवार है परंतु वेबीनार के सभी साधर्मीजनो का श्रेष्ठ परिवार हैं। विजयलक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी ।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
