पैसा, दिमाग, पूण्य,पुरुषार्थ सब कुछ है तो वह भावों का खेल है। मुनि श्रमण सागर जी

धर्म

पैसा, दिमाग, पूण्य,पुरुषार्थ सब कुछ है तो वह भावों का खेल है। मुनि श्रमण सागर जी
हायकू की ज्ञान परीक्षा 25 अक्टूबर को होगी

।राघौगढ़ 16 अक्टूबर।

दिगंबर जैन आचार्य, इस सदी के महान संत, विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य महा तपस्वी और औजस्वी वक्ता, बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने चातुर्मास में राघौगढ़ में जारी श्रमण धारा प्रवचन माला के 90 वे दिन विद्यासागर सभागार राघौगढ़ में “भावों का खेल क्या है” इस विषय पर मंगल प्रवचन करते हुए कहा जैन दर्शन में भावों की महिमा का मुख्य रूप से उल्लेख किया है। जैन धर्म भाव प्रधान हैं। उदाहरण देते हुए समझाया एक गुरुकुल में कुल गुरु के मार्गदर्शन में बच्चे पढ़ते थे। एक दिन गुरु जी ने चार शिष्यों का चयन किया और पहले से पूछा दुनिया में सबसे ज्यादा महत्व किस वस्तु का है शिष्य ने उत्तर दिया दुनिया में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण पैसा है पैसा अगर नहीं है तो आपका जीवन बेकार है। दूसरे से गुरु जी ने पूछा क्या यह उत्तर सही है दूसरे ने कहा दुनिया में सबसे ज्यादा महत्व दिमाग का है पैसा तो दिमाग से ही कमाया जाता है।

 

शिष्य ने धीरू भाई अंबानी का उल्लेख किया।गुरु जी ने कहा दिमाग बहुत कुछ है सब कुछ नहीं। अगर दुनिया दिमाग से चलती तो बीरबल स्वयं बादशाह होता। गुरु जी ने तीसरे से पूछा दुनिया में सब खेल किसका है। शिष्य ने उत्तर दिया सब खेल पुण्य का है। पुण्य नहीं होगा तो पैसा और दिमाग काम नहीं आएंगे। गुरुजी इस उत्तर से भी संतुष्ट नहीं हुए और चौथे शिष्य से पूछा मेरे प्रश्न का उत्तर दें। उस शिष्य ने कहा दुनिया में सब कुछ पुरुषार्थ से होता है। सब कुछ श्रम करने से मिलता है श्रम नहीं करेंगे तो कुछ नहीं मिलेगा। गुरुजी चारों शिष्यों के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने चारों शिष्यों को एक साथ बिठाकर कहा दुनिया में सारा खेल भावों का है।

 

 

पैसा, दिमाग, पुण्य पुरुषार्थ सब कुछ है तो वह भावों का खेल है। जिसके भावों में निर्मलता है वह नरक नहीं जा सकता। मुनिराज ने कहा जैन धर्म भाव प्रधान है आप मंदिर में भगवान की पूजन कर रहे हैं और आपके मन में यह भाव आते हैं कि जैसे ही मंदिर खाली हो मैं छत्र को चुरा कर ले जाऊं। इन भावों से निश्चित आपकी दुर्गति होगी। दूसरी और आप निर्मल भावों से भगवान की भक्ति करेंगे तो उसका फल मिलेगा। प्रवचन के समापन में मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने स्वरचित कविता सुनाई शीर्षक है ‘बहुत हो गई दुनियादारी मुझे निरंजन बनना है।

चातुर्मास कार्यक्रम संयोजक विकास कुमार जैन ने जानकारी दी है आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज द्वारा रचित ज्ञानवर्धक हायकू की परीक्षा मुनि ओंकार सागर जी महाराज के निर्देशन में आगामी 25 अक्टूबर को दोपहर 1:00 बजे आयोजित की गई है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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