*खिड़की से क्यों देखता, दिखे दुखद संसार; अंतर्मन में झांकने से मिलेगा सुख : निर्यापक मुनि श्री समतासागर*
कुण्डलपुर।
जीवन का वास्तविक सार समझने के लिए केवल देखना, जानना और चलना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सही दृष्टि, सम्यक ज्ञान और सदाचरण के साथ आगे बढ़ना जरूरी है। जीवन में सफलता और शांति तभी मिलती है, जब व्यक्ति परिस्थितियों के प्रभाव में बहने के बजाय वास्तविकता को समझकर अपने विचारों और व्यवहार को दिशा देता है। आचार्यों की सूक्तियां और शास्त्रों के सूत्र केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे व्यावहारिक जीवन को बेहतर बनाने का मार्ग भी दिखाते हैं। यह विचार निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि मुनि श्री ने जीवन में सम्यक दृष्टि, ज्ञान और आचरण के महत्व को समझाते हुए कहा कि आचार्यों द्वारा रचित नीतियां शाश्वत होती हैं। समय के साथ साधन, परिस्थितियां और रहन-सहन बदल सकते हैं, लेकिन जीवन को सही दिशा देने वाले सिद्धांत नहीं बदलते। तत्वार्थ सूत्र का सूत्र ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः’ इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र मोक्ष के मार्ग हैं। इनका व्यावहारिक अर्थ है कि व्यक्ति सही दृष्टि से देखे, सही ढंग से समझे और उसके अनुरूप आचरण करे। केवल देखना, जानना और चलना पर्याप्त नहीं, क्योंकि गलत दृष्टि, गलत समझ और गलत आचरण व्यक्ति को मंजिल से दूर कर सकते हैं।मुनि श्री ने आचार्य श्री के दोहे ‘खिड़की से क्यों देखता, दिखे दुखद संसार, खिड़की में अब देख ले, मिले सुखद साकार’ के माध्यम से आत्मचिंतन की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि मकान और घर में अंतर होता है। मकान ईंट-पत्थर की इमारत है, जबकि उसमें रहने वाले सदस्यों के प्रेम, अपनत्व और संबंधों से घर बनता है। घर की वास्तविक सुंदरता उसकी बनावट में नहीं, बल्कि उसमें रहने वालों के भावों में होती है। इसी तरह जीवन का सुख भी बाहरी साधनों से अधिक हमारे भीतर के भावों पर निर्भर करता है।
उन्होंने कहा कि शरीर की आंखें भी खिड़कियों की तरह हैं। इनके माध्यम से मनुष्य संसार को देखता है, लेकिन बाहर दिखाई देने वाली परिस्थितियों को ही सुख-दुख का आधार बना लेता है। जब तक मन के अनुसार सब कुछ होता रहता है, संसार अच्छा लगता है। जैसे ही कोई इच्छा पूरी नहीं होती या कोई व्यक्ति हमारी बात नहीं मानता, वही संसार दुखद लगने लगता है। इससे स्पष्ट है कि सुख-दुख की अनुभूति अक्सर बाहरी परिस्थितियों से अधिक हमारी अपेक्षाओं और मानसिक स्थिति पर निर्भर करती है।
मुनि श्री ने राग और वैराग्य के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशान होकर घर छोड़ने का विचार करना वास्तविक वैराग्य नहीं है। जब तक मन के अनुसार काम नहीं होता, तब तक व्यक्ति वैराग्य की बातें करता है और इच्छा पूरी होते ही फिर संसार के प्रति राग जाग उठता है। यह अनुकूलता और प्रतिकूलता पर आधारित मनोदशा है। सच्चा वैराग्य संसार के वास्तविक स्वरूप को समझने से उत्पन्न होता है। व्यक्ति जब यह जान लेता है कि संसार परिवर्तनशील है और बाहरी अनुकूलताएं स्थायी सुख नहीं दे सकतीं, तभी उसके भीतर स्थायी वैराग्य का भाव विकसित होता है। परिस्थितियों के कारण लिया गया निर्णय परिस्थितियां बदलने पर बदल सकता है, लेकिन वास्तविकता के ज्ञान से उत्पन्न वैराग्य टिकाऊ होता है।महाराष्ट्र के सांगली नगर का प्रसंग सुनाते हुए मुनि श्री ने बताया कि वहां उन्होंने पूछा था कि यह नगर सांगली है या चांगली। मराठी में ‘चांगली’ का अर्थ अच्छा होता है। इस पर एक व्यक्ति ने कहा कि महाराज श्री, जब तक आप यहां हैं, तब तक यह चांगली है और आपके जाने के बाद फिर सांगली रह जाएगी। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि जहां धर्म, सद्विचार और सदाचरण का प्रभाव रहता है, वहां जीवन की दृष्टि बदल जाती है। धर्म का संबंध केवल बाहरी गतिविधियों से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर आने वाले परिवर्तन से है। धर्म जीवन से जुड़ा रहता है तो व्यवहार में अच्छाई बनी रहती है; उसके मूल संदेश को भूलते ही व्यक्ति फिर पुराने आग्रहों और अपेक्षाओं में उलझ जाता है।मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि संसार की खिड़की से बाहर झांकने के साथ अपने भीतर भी झांकना सीखें। दूसरों की कमियां देखने के बजाय अपने विचारों, अपेक्षाओं और व्यवहार का परीक्षण करें। आत्मचिंतन से ही व्यक्ति अपने दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास कर सकता है। बाहरी परिस्थितियों को बदलना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन उन्हें देखने का दृष्टिकोण और अपने आचरण को सुधारना हमारे हाथ में है। यही दृष्टि जीवन में वास्तविक शांति और सुख का आधार बन सकती है।कुण्डलपुर में चल रहे चातुर्मास की धर्मप्रभावना का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से बड़े बाबा के दर्शन, भक्ति, अभिषेक और शांतिधारा में सहभागी बनने तथा संपूर्ण सिद्धक्षेत्र की वंदना करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि तीर्थयात्रा केवल दर्शन करके लौट आने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यहां से ऐसे विचार और संकल्प लेकर जाना चाहिए, जो जीवन को धर्ममय बनाने में सहायक हों।उन्होंने आगामी 24 एवं 25 अक्टूबर को कुण्डलपुर में आयोजित होने वाले गुरु परंपरा समर्पण समारोह को भी महत्वपूर्ण बताया। मुनि श्री ने कहा कि आचार्यों और गुरुओं की महान परंपरा ने संघों तथा समाज को समय-समय पर मार्गदर्शन दिया है। इस परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और उसके संरक्षण एवं संवर्धन में समर्पित प्रतिभाओं का सम्मान करना आवश्यक है। यह समारोह गुरु परंपरा के गुणानुवाद के साथ उसके आदर्शों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
