नजर नहीं, विवेक की आंखें खोलिए; तभी सच और भ्रम का अंतर समझ आएगा प्रसन्नसागर महाराज
मौन साधना में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज का संदेश—ज्ञान और समझ के अभाव में बिगड़ते हैं रिश्ते
पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ (मध्य प्रदेश)।
“नजर चाहे कितनी भी खुली क्यों न हो, यदि स्वयं की समझ और विवेक की आंख बंद है, तो सब कुछ गलत ही दिखाई देगा।” यह प्रेरक संदेश व्रत चक्रवर्ती, पट्ट विभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपनी मौन साधना एवं एकांतवास के दौरान लिखित रूप में दिया। उनके इस संदेश में जीवन की गहरी सीख छिपी है कि किसी भी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के बारे में सही निर्णय लेने के लिए केवल आंखों से देखना पर्याप्त नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक और अनुभव का होना भी आवश्यक है।
नीलम के हार की कहानी से समझाया विवेक का महत्व
अपने संदेश में आचार्य श्री ने एक जौहरी के परिवार की प्रेरक कहानी के माध्यम से ज्ञान और विवेक का महत्व समझाया।
एक जौहरी के निधन के बाद उसका परिवार आर्थिक संकट में घिर गया। घर में भोजन तक की समस्या उत्पन्न हो गई। एक दिन जौहरी की पत्नी ने अपने बेटे को नीलम का एक हार देकर कहा कि वह उसे अपने चाचा की दुकान पर ले जाए और बेचकर कुछ रुपये ले आए।
लड़का हार लेकर अपने चाचा के पास पहुंचा। चाचा ने हार को ध्यानपूर्वक देखा और कहा, “बेटा, अभी बाजार में मंदी है। थोड़ा इंतजार करना, उचित समय आने पर इसके अच्छे दाम मिल जाएंगे।” उन्होंने लड़के को कुछ रुपये दिए और अगले दिन से दुकान पर आकर बैठने के लिए कहा।
इसके बाद लड़का प्रतिदिन दुकान पर जाने लगा और धीरे-धीरे हीरे-जवाहरात की परख करना सीख गया। समय के साथ वह रत्नों का अच्छा पारखी बन गया। अब दूर-दूर से लोग अपने कीमती रत्नों की जांच कराने उसके पास आने लगे।
एक दिन चाचा ने उससे कहा कि वह अपनी मां से वही हार लेकर आए, क्योंकि अब बाजार में तेजी है और उसके अच्छे दाम मिल सकते हैं। लड़के ने घर जाकर हार को ध्यानपूर्वक परखा, तो उसे पता चला कि हार नकली है। वह हार घर पर ही छोड़कर दुकान लौट आया।
चाचा ने पूछा, “बेटा, हार नहीं लाए?”
लड़के ने उत्तर दिया, “चाचाजी, वह हार तो नकली है।”
इस पर चाचा ने समझाया कि जब वह पहली बार हार लेकर आया था, तब यदि वे उसे नकली बता देते, तो परिवार संकट की घड़ी में यही सोचता कि बुरा समय आने पर चाचा उनकी वस्तु को भी नकली बता रहे हैं। लेकिन आज जब लड़के ने स्वयं रत्नों की परख करना सीख लिया, तो उसे वास्तविकता अपने आप समझ में आ गई।
ज्ञान के बिना अधूरी है हमारी समझ
आचार्य श्री का संदेश है कि जीवन में अनेक बार हम अधूरी जानकारी के आधार पर दूसरों के बारे में धारणा बना लेते हैं। बिना सच्चाई जाने किसी की बातों का गलत अर्थ निकाल लेते हैं और छोटी-छोटी गलतफहमियों के कारण अपने रिश्तों में दूरियां पैदा कर लेते हैं।
ज्ञान, अनुभव और विवेक के अभाव में हमारी दृष्टि भ्रमित हो सकती है। इसलिए किसी भी परिस्थिति पर निर्णय देने से पहले उसकी वास्तविकता को समझना चाहिए। दूसरों को गलत ठहराने से पहले स्वयं के विचारों की भी परीक्षा करनी चाहिए। जब हमारी समझ विकसित होती है, तब वही परिस्थितियां और वही लोग हमें एक नए दृष्टिकोण से दिखाई देने लगते हैं।
आचार्य श्री ने जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की प्रेरणा देते हुए प्रार्थना के भाव भी व्यक्त किए—
“ऐ जिंदगी! मुश्किलों के सदा हल दे,
मन इतना मजबूत हो कि थक सके ना हम।
फुर्सत के कुछ अनोखे पल दे,
परमात्मा से प्रार्थना है कि
कल से अच्छा आज और आज से बेहतर कल दे।”
आचार्य श्री का यह संदेश समाज को आत्मचिंतन, धैर्य, सकारात्मकता और विवेकपूर्ण व्यवहार की प्रेरणा देता है। यदि मनुष्य अपनी दृष्टि के साथ-साथ अपनी समझ को भी विकसित करे, तो अनेक गलतफहमियों से बच सकता है और अपने पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों को अधिक मधुर बना सकता है।
नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल
प्रचार-प्रसार संयोजक, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 99297 47312




