सत्य वचन ही आत्मकल्याण का मार्ग, वाणी में हो सत्य के साथ विवेक और करुणा : मुनि श्री योगसागर जी
बोले—सत्य अणुव्रत केवल झूठ से बचना नहीं, ऐसी वाणी से बचना भी है जिससे किसी के सम्मान, मन या जीवन को पीड़ा पहुंचे
कोटा।
पुण्योदय अतिशय क्षेत्र दादाबाड़ी नसियां जी में चल रहे चातुर्मास के दौरान निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 55 एवं 56 के माध्यम से सत्य अणुव्रत और उसके अतिचारों की विस्तारपूर्वक व्याख्या की। उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने भीतर मौजूद पाप प्रवृत्तियों के कारण परम पद की ओर बढ़ने से रुक जाता है। आत्मकल्याण के लिए जीवन में सत्य, संयम और सदाचार को उतारना आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि सत्य व्रत का पालन केवल स्वयं झूठ न बोलने तक सीमित नहीं है। ऐसी वाणी से बचना भी सत्य अणुव्रत का हिस्सा है, जिससे किसी व्यक्ति के पद, सम्मान, प्रतिष्ठा अथवा जीवन को हानि पहुंचे। न स्वयं असत्य बोलें, न दूसरों से असत्य कहलवाएं और न ही ऐसी बात कहें, जो किसी के लिए पीड़ा या अहित का कारण बने।
उन्होंने कहा कि हमारी वाणी ऐसी होनी चाहिए, जो सामने वाले के मन को शीतलता प्रदान करे। कटु और असत्य वचन दूसरों के मन को चोट पहुंचाने के साथ स्वयं के लिए भी कर्मबंधन का कारण बनते हैं। इसलिए बोलने से पहले विचार करना चाहिए कि हमारे शब्द किसी के मन को तोड़ेंगे या जोड़ेंगे।

सत्य के साथ हित, मधुरता और विवेक भी जरूरी
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि सत्य बोलना धर्म है, लेकिन सत्य के साथ हित, मधुरता और विवेक का होना भी आवश्यक है। ऐसा सत्य किसी के जीवन में प्रकाश बनकर आए, न कि अनावश्यक कटुता और पीड़ा का कारण बने।
उन्होंने कहा कि एकदेश सत्य अणुव्रत गृहस्थ जीवन का महत्वपूर्ण आधार है। स्वार्थ, लोभ, भय अथवा किसी अन्य कारण से सत्य व्रत में शिथिलता नहीं आनी चाहिए। असत्य के पीछे कई बार हिंसा, कपट और परिग्रह जैसी प्रवृत्तियां भी जुड़ जाती हैं, जो आत्मशुद्धि के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती हैं।
असत्य केवल शब्दों का दोष नहीं है, बल्कि उसके पीछे छिपा स्वार्थ, छल, भय और लोभ भी आत्मा को कर्मबंधन में बांधता है। इसलिए श्रावक को अपनी वाणी के साथ-साथ विचार और व्यवहार में भी सजग रहना चाहिए।
भगवान की पूजा के साथ उनके बताए मार्ग पर चलना जरूरी
मुनिश्री ने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु के मार्ग को जीवन में उतारकर ही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। केवल भगवान की पूजा करने से नहीं, बल्कि भगवान द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने से मनुष्य स्वयं परमात्म पद की दिशा में अग्रसर होता है।
उन्होंने कहा कि जिनवाणी केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए है। जब हमारे विचार, वचन और आचरण में धर्म दिखाई देने लगे, तभी धार्मिक साधना सार्थक मानी जा सकती है।
वाणी छोटी, लेकिन प्रभाव बहुत बड़ा
सत्य व्रत के अतिचारों को समझाते हुए मुनिश्री ने कहा कि असत्य भाषण, दूसरे से असत्य कहलवाना तथा ऐसी वाणी का प्रयोग करना जिससे किसी को हानि या पीड़ा पहुंचे—ये सभी आत्मिक प्रगति में बाधक हैं।
उन्होंने कहा कि वाणी छोटी सी है, लेकिन उसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। इसलिए हर व्यक्ति को बोलने से पहले यह विचार करना चाहिए कि उसके शब्द सामने वाले के मन में शांति, विश्वास और सद्भाव उत्पन्न करेंगे या पीड़ा और कटुता।
मुनिश्री ने कहा कि सत्य व्रत केवल बोलने की मर्यादा नहीं, बल्कि विचारों की पवित्रता और व्यवहार की सरलता का भी मार्ग है। जब सत्य के साथ विवेक और करुणा जुड़ जाती है, तब वाणी स्वयं धर्म का माध्यम बन जाती है।
🌺 आज के प्रमुख पुण्यार्जक
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट सहित विभिन्न धार्मिक अवसरों पर श्रद्धालु परिवारों ने पुण्यार्जन किया।
चातुर्मास कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्रीमान महेंद्र कुमार जी, अश्वनी जी, विद्या जी, सार्थक जी, उत्कर्ष जी एवं समस्त धनोप्या परिवार, बसंत विहार द्वारा किया गया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान विनोद कुमार, ऋषभ एवं अभिषेक खटोड़ परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई-अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक किया।
श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ मंजू जी पाटनी को प्राप्त हुआ।
वहीं श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमान अजित जी, विकास जी एवं प्रीति लुहाड़िया को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक संपन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश
“सत्य केवल झूठ न बोलने का नाम नहीं, बल्कि ऐसी वाणी बोलने की साधना है जिससे किसी के मन, सम्मान या जीवन को अनावश्यक पीड़ा न पहुंचे। बोलने से पहले विचार करें कि हमारे शब्द किसी के मन को तोड़ेंगे या जोड़ेंगे। सत्य के साथ हित, मधुरता और विवेक जुड़ जाए तो वाणी धर्म का माध्यम बन जाती है। देव-शास्त्र-गुरु के मार्ग को जीवन में उतारकर ही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।”
प्रवचन का सार
सत्य व्रत आत्मशुद्धि का मार्ग है। असत्य, कटुता, छल और स्वार्थ से बचते हुए ऐसी वाणी का प्रयोग करना चाहिए, जिसमें सत्य के साथ करुणा, विवेक और हित का भाव हो। वाणी पर संयम रखना केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि आत्मकल्याण की दिशा में बढ़ाया गया महत्वपूर्ण कदम है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312




