सुधासागर महाराज वैराग्य की धारा

काव्य रचना

सुधासागर महाराज वैराग्य की धारा

सुधासागर महाराज—वैराग्य की वह धारा

शब्दों में जिनको बांध सकें,

ऐसे संत नहीं होते,

जिनके दर्शन से मन बदले,

वे साधारण संत नहीं होते।

निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 सुधासागर जी महाराज,

नाम स्वयं जैसे अमृतधारा,

वाणी में अध्यात्म की गहराई,

आचरण में त्याग का उजियारा।

चलते हैं तो राह पवित्र हो,

ठहरें तो वातावरण निखर जाए,

एक दृष्टि पड़े जिन पर उनकी,

मन का अंधियारा दूर हो जाए।

न धन का मोह, न मान की चाह,

न संसार की चकाचौंध भाए,

संयम की राह पर बढ़ते-बढ़ते,

जीवन को जीवन का अर्थ बताए।

उनकी वाणी केवल प्रवचन नहीं,अंतरमन को जगाने वाली पुकार है,

हर शब्द में आत्मा की आहट,

हर संदेश में मुक्ति का द्वार है।

वे कहते हैं—पहले स्वयं को जीतो,

फिर जग जीतने की बात करो,

बाहर की दुनिया बदलने से पहले,

अपने भीतर की रात हरों।

गुरु के चरणों में झुकता मस्तक,

मन में श्रद्धा का दीप जलाता है,

सुधासागर की एक प्रेरणा से,

भटका जीवन राह पाता है।

त्याग जहां आभूषण बन जाए,

संयम जहां पहचान बने,

वैराग्य जहां जीवन की भाषा हो,

वहीं संतों की सच्ची शान बने।

हे सुधासागर! आपकी साधना,

पीढ़ियों को राह दिखाती रहे,

धर्म की यह निर्मल गंगा,

जन-जन के मन तक जाती रहे।

आपके चरणों की धूल मिले तो,

जीवन धन्य समझ लेंगे हम,

आपकी वाणी हृदय में बस जाए,

तो यही मानेंगे पुण्य हमारा कम।

नमन उस तप की ऊंचाई को,

नमन उस निर्मल ज्ञान को,

नमन उस संयम की शक्ति को,

नमन सुधासागर भगवान को।

आप संत नहीं, प्रेरणा की वह ज्योति हैं,

जो स्वयं जलकर भी जग को प्रकाश देती है।

आपकी साधना की एक किरण,

असंख्य जीवनों को दिशा देती है।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

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